नई दिल्ली की एक अदालत ने गुरुवार (29 जनवरी, 2026) को दिल्ली के उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना को वर्ष 2000 के एक मानहानि मामले में बरी कर दिया। यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर द्वारा दायर किया गया था। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि शिकायतकर्ता अपने आरोपों को साबित करने में असफल रहीं।
यह फैसला न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी राघव शर्मा ने सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले में प्रस्तुत साक्ष्य और गवाह आरोपों की पुष्टि के लिए पर्याप्त नहीं हैं, इसलिए आरोपी को दोषमुक्त किया जाता है।
गौरतलब है कि मार्च 2025 में इसी अदालत ने मेधा पाटकर की उस अर्जी को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने अतिरिक्त गवाहों को पेश करने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने उस समय कहा था कि यह आवेदन मुकदमे को टालने का जानबूझकर किया गया प्रयास है, न कि किसी वास्तविक आवश्यकता के तहत दायर किया गया।
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मेधा पाटकर और वी.के. सक्सेना के बीच यह कानूनी विवाद पिछले 25 वर्षों से चल रहा था। वर्ष 2000 में पाटकर ने सक्सेना के खिलाफ आरोप लगाया था कि उन्होंने उनके और ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के खिलाफ विज्ञापन प्रकाशित कर उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया। उस समय वी.के. सक्सेना अहमदाबाद स्थित एक गैर-सरकारी संगठन ‘काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज’ के प्रमुख थे।
इसके जवाब में, वर्ष 2001 में वी.के. सक्सेना ने भी मेधा पाटकर के खिलाफ दो अलग-अलग मानहानि के मामले दर्ज कराए थे। इन मामलों में आरोप था कि पाटकर ने एक टीवी चैनल पर उनके खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां कीं और एक कथित मानहानिकारक प्रेस बयान जारी किया।
अदालत के ताजा फैसले के साथ ही यह लंबे समय से चला आ रहा मानहानि विवाद कानूनी रूप से समाप्त हो गया है, जिसे एक अहम न्यायिक निर्णय के रूप में देखा जा रहा है।
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