दशकों से वैश्विक तेल बाजार की दिशा मध्य पूर्व तय करता रहा है, लेकिन हाल के ईरान संकट ने एक नया समीकरण सामने रखा है। इस बार सबसे बड़ा प्रभाव उस देश का दिखा, जो किसी वार्ता का हिस्सा नहीं था—चीन।
विशेषज्ञों के अनुसार चीन अब न सिर्फ दुनिया का सबसे बड़ा तेल खरीदार है, बल्कि ऊर्जा मांग को प्रभावित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण देश भी बन चुका है। ईरान संकट के दौरान चीन ने रूस और ईरान से रियायती दरों पर बड़े पैमाने पर तेल खरीदकर अपने रणनीतिक और व्यावसायिक भंडार को मजबूत किया। अनुमान है कि उसके पास 1 अरब बैरल से अधिक कच्चा तेल भंडारित है।
संकट के समय चीन ने आयात में लगभग 30 लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती की और अपनी रिफाइनरियों के भंडार का उपयोग कर घरेलू जरूरतें पूरी कीं। इससे वैश्विक बाजार में अचानक मांग नहीं बढ़ी और तेल कीमतों में तेज उछाल को रोका जा सका।
और पढ़ें: कतर गैस प्लांट विस्फोट में 13 की मौत, भारतीय भी शामिल; दूतावास ने जारी किए हेल्पलाइन नंबर
इसी अवधि में चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों के तेज विस्तार ने भी तेल की मांग को काफी घटा दिया। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, ईवी के कारण प्रतिदिन लगभग 10 लाख बैरल तेल की खपत कम हुई। इसके अलावा निर्यात कोटा में कटौती और रिफाइनरी उत्पादन में कमी ने भी आयात दबाव घटाया।
विश्लेषकों का मानना है कि चीन की यह रणनीति वैश्विक तेल बाजार के लिए “अदृश्य संतुलन शक्ति” साबित हुई। जब दुनिया आपूर्ति संकट से जूझ रही थी, चीन की घटती मांग ने कीमतों को स्थिर रखने में मदद की।
हालांकि यह स्थिति अस्थायी मानी जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, जब भी तेल कीमतें नीचे आएंगी, चीन अपने भंडार फिर से भरने के लिए बाजार में बड़े खरीदार के रूप में लौट सकता है।
अगर भविष्य में होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह खुलता है और मध्य पूर्व से आपूर्ति बढ़ती है, तो 2027 तक वैश्विक तेल बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति की स्थिति बन सकती है। इस संतुलन में चीन की भूमिका निर्णायक रहेगी।
और पढ़ें: ओडिशा में बड़ा घूसकांड: रिटायरमेंट से पहले विजिलेंस ने इंजीनियर को 2 लाख रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा