भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान होने वाली बारिश को लेकर एक महत्वपूर्ण अध्ययन सामने आया है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम), पुणे के शोधकर्ताओं के अनुसार, देश में होने वाली कुल मानसूनी बारिश का लगभग एक चौथाई हिस्सा जमीन तक पहुंचने से पहले ही हवा में वाष्पित हो जाता है।
अध्ययन में बताया गया है कि जून से सितंबर के बीच मानसूनी बारिश के दौरान करीब 25 प्रतिशत बारिश का द्रव्यमान हवा में ही खत्म हो जाता है। शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन विशेष रूप से उत्तर-पश्चिमी पश्चिमी घाट क्षेत्र में किया है। यह पहली बार है जब भारत में किसी प्रयोग के जरिए यह पता लगाया गया है कि बारिश का कितना हिस्सा रास्ते में ही वाष्पित हो जाता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, बारिश की यह प्रक्रिया मौसम और जलवायु प्रणाली को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बारिश की बूंदें जब बादलों से जमीन की ओर गिरती हैं, तो रास्ते में तापमान, नमी और हवा की स्थिति के कारण उनका कुछ हिस्सा फिर से जलवाष्प में बदल जाता है। इस प्रक्रिया को वाष्पीकरण या वाष्पीकरणीय नुकसान कहा जाता है।
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आईआईटीएम पुणे के शोधकर्ताओं का कहना है कि इस खोज से मौसम और जलवायु मॉडल को और अधिक सटीक बनाने में मदद मिलेगी। इससे वैज्ञानिक मानसून की गतिविधियों, बारिश के वितरण और जल संसाधनों के बेहतर आकलन में सक्षम हो सकेंगे।
अध्ययन में यह भी कहा गया है कि हवा में वाष्पित होने वाली बारिश की मात्रा सभी क्षेत्रों में समान नहीं होती। अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों, तापमान, हवा की गति और नमी के स्तर के आधार पर इसमें बदलाव हो सकता है।
भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है। ऐसे में बारिश के वास्तविक प्रभाव को समझना मौसम पूर्वानुमान और जल प्रबंधन के लिए बेहद जरूरी है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह अध्ययन भविष्य में मानसून की बेहतर समझ विकसित करने और बदलते जलवायु प्रभावों का आकलन करने में वैज्ञानिकों की मदद करेगा।
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