आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कहा गया है कि भारत को अपने कृषि निर्यात को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने के लिए एक स्थिर, भरोसेमंद और दीर्घकालिक कृषि-निर्यात नीति अपनाने की आवश्यकता है। सर्वेक्षण ने चेतावनी दी कि बार-बार और अचानक लगाए जाने वाले व्यापार प्रतिबंध आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करते हैं और भारत की विश्वसनीय निर्यातक के रूप में छवि को नुकसान पहुंचाते हैं।
सर्वेक्षण के अनुसार, कृषि निर्यात भारत के लिए “कम प्रयास में अधिक लाभ” देने वाला क्षेत्र है और इसमें अपार संभावनाएं हैं। साथ ही यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को रणनीतिक बढ़त भी प्रदान करता है। हालांकि, वित्त वर्ष 2022-23 से 2024-25 के बीच भारत का कृषि निर्यात लगभग स्थिर बना रहा, जबकि वैश्विक कृषि व्यापार इसी अवधि में बढ़कर 2024 में 2.4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया।
भारत का लक्ष्य अगले चार वर्षों में कृषि, समुद्री उत्पादों तथा खाद्य एवं पेय पदार्थों के संयुक्त निर्यात को बढ़ाकर 100 अरब डॉलर तक ले जाना है। यह लक्ष्य वित्त वर्ष 2024-25 में दर्ज 51.1 अरब डॉलर के कृषि निर्यात की तुलना में लगभग दोगुना है।
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विश्व व्यापार संगठन (WTO) के आंकड़ों के अनुसार, मूल्य के लिहाज से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक होने के बावजूद भारत की वैश्विक कृषि निर्यात में हिस्सेदारी केवल 2.2% है, जो वर्ष 2000 में 1.1% थी। सर्वेक्षण ने इसे “अब तक अप्रयुक्त बड़ी संभावना” बताया।
हालांकि 2019-20 से 2024-25 के बीच कृषि निर्यात की वार्षिक संयुक्त वृद्धि दर 8.2% रही, जो कुल वस्तु निर्यात वृद्धि दर से अधिक है, फिर भी हाल के वर्षों में ठहराव चिंता का विषय है। सर्वेक्षण ने कहा कि निर्यात प्रतिबंध, न्यूनतम निर्यात मूल्य और अचानक नीतिगत बदलाव विदेशी खरीदारों को अन्य देशों की ओर मोड़ सकते हैं।
आर्थिक सर्वेक्षण ने घरेलू कीमतों को नियंत्रित करने के लिए निर्यात प्रतिबंधों के बजाय वैकल्पिक उपाय सुझाए, जैसे—सब्सिडी युक्त खाद्य वितरण, बफर स्टॉक प्रबंधन, बाजार हस्तक्षेप और जमाखोरी विरोधी कड़े कदम। सर्वेक्षण का निष्कर्ष है कि घरेलू आपूर्ति और कीमतों को संतुलित रखते हुए किसानों को वैश्विक बाजारों से बेहतर आय दिलाना संभव है।
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