15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के समय देश के सामने केवल राष्ट्र निर्माण की चुनौती नहीं थी, बल्कि समुद्री सीमाओं और सामरिक हितों की रक्षा के लिए मजबूत नौसेना खड़ी करना भी जरूरी था। विभाजन के दौरान नौसैनिक संसाधनों और अड्डों का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के हिस्से में चला गया। इसके बावजूद भारत ने सीमित संसाधनों से आधुनिक ब्लू-वॉटर नेवी बनने की दिशा में लंबी यात्रा शुरू की।
भारतीय नौसेना के सेवानिवृत्त कमोडोर सी.डी. बालाजी के अनुसार, इस सफर को कई महत्वपूर्ण चरणों में समझा जा सकता है। 1950 में गणतंत्र बनने के बाद नौसेना के नाम से ‘रॉयल’ शब्द हटाया गया। 1958 में एडमिरल रामदास कटारी पहले भारतीय नौसेना प्रमुख बने। इसके बाद आईएनएस दिल्ली, आईएनएस मैसूर और 1961 में आईएनएस विक्रांत जैसे युद्धपोतों के साथ भारत ने समुद्री शक्ति बढ़ानी शुरू की।
1961 के गोवा मुक्ति अभियान में नौसेना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऑपरेशन विजय के तहत समुद्री नाकाबंदी की गई और पुर्तगाली ठिकानों के खिलाफ कार्रवाई की गई। इसके बाद 1965 के युद्ध ने नौसेना को अपनी कमियों का आकलन कर तेजी से आधुनिकीकरण करने का अवसर दिया।
और पढ़ें: भारतीय नौसेना को मिला एक और एमएच-60आर सीहॉक हेलिकॉप्टर, समुद्री सुरक्षा क्षमता होगी मजबूत
1971 का युद्ध भारतीय नौसेना के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय बना। ऑपरेशन ट्राइडेंट के तहत मिसाइल नौकाओं ने कराची बंदरगाह पर हमला किया और पाकिस्तानी युद्धपोतों को नुकसान पहुंचाया। इसके बाद ऑपरेशन पायथन ने कराची के तेल भंडार को भारी नुकसान पहुंचाया। पूर्वी मोर्चे पर आईएनएस विक्रांत ने नाकेबंदी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
समय के साथ भारत ने विमानवाहक पोत, आधुनिक विध्वंसक, फ्रिगेट, परमाणु पनडुब्बियां और अत्याधुनिक नौसैनिक विमान विकसित किए। आईएनएस अरिहंत जैसे स्वदेशी परमाणु ऊर्जा चालित पनडुब्बियों ने भारत की समुद्री परमाणु क्षमता को मजबूत किया।
तकनीकी क्षेत्र में भी नौसेना ने बड़ा बदलाव किया है। पुराने रडार और मैनुअल हथियार प्रणालियों से आगे बढ़कर अब आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, स्टील्थ तकनीक, निर्देशित मिसाइल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल हो रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत अब ‘खरीदार नौसेना’ से ‘निर्माता नौसेना’ बन चुका है। हालांकि कुछ प्रणालियों में विदेशी तकनीक पर निर्भरता अभी बनी हुई है। लक्ष्य 2047 तक पूरी तरह आत्मनिर्भर नौसेना बनने का है।
और पढ़ें: भारत ने सिंधु जल संधि पर रुख दोहराया, पीओके में अत्याचार और सीमा पार आतंकवाद पर जताई चिंता