उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले दलित समुदाय के लिए राजनीतिक गतिविधियां जोर पकड़ रही हैं। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक और दलित समाज के अधिकारों के लिए लंबे समय से संघर्षरत कांशीराम की 15 मार्च को जन्म जयंती के आसपास विभिन्न राजनीतिक दल दलित समुदाय के बीच अपनी पहुँच बढ़ाने में जुट गए हैं।
राज्य में अनुसूचित जातियों का हिस्सा लगभग 21% है, जो इसे उत्तर प्रदेश की राजनीति में निर्णायक वोट बैंक बनाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक दल अपनी सक्रियता बढ़ाकर दलित समुदाय के बीच खुद को उनके अधिकारों और हितों का संरक्षक के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
विशेषकर बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने कांशीराम की जयंती के अवसर पर विभिन्न रैलियों, बैठक और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए हैं, ताकि दलित वर्ग के साथ सीधे संपर्क बन सके और आगामी चुनाव में उनका समर्थन सुनिश्चित किया जा सके।
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अन्य प्रमुख राजनीतिक दल जैसे भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस भी दलितों तक अपनी पहुँच बढ़ाने के प्रयास में हैं। ये दल सामाजिक और आर्थिक विकास, आरक्षण, और शिक्षा जैसे मुद्दों पर अपनी प्रतिबद्धता को दलित वोटरों तक पहुँचाने की रणनीति अपना रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि कांशीराम के व्यक्तित्व और उनके आंदोलन के प्रतीक के रूप में उनकी जयंती दलित समुदाय के लिए एक राजनीतिक और सामाजिक रैलींग प्वाइंट बन चुकी है। यह राजनीतिक दलों के लिए केवल एक अवसर नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के 21% दलित वोट बैंक पर अपनी पकड़ मजबूत करने का रणनीतिक अवसर भी है।
राजनीतिक समीकरण और दलित वोटरों की भूमिका आगामी विधानसभा चुनाव में राज्य की सत्ता के लिए निर्णायक साबित हो सकती है। कांशीराम की जयंती इस अवसर पर दलित समुदाय के जागरूक होने और उन्हें राजनीतिक प्रक्रियाओं में सक्रिय रूप से शामिल होने का प्रतीक बन गई है।
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