कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन लिमिटेड (केपीटीसीएल) के उस नियम को बरकरार रखा है, जिसके तहत भ्रष्टाचार के मामलों में विभागीय जांच लोकायुक्त के जांच प्रकोष्ठ को सौंपी जा सकती है। अदालत की खंडपीठ ने पहले दिए गए एकल न्यायाधीश के फैसले को रद्द कर दिया।
न्यायमूर्ति डी.के. सिंह और न्यायमूर्ति एस. रचैया की खंडपीठ ने यह आदेश उस अपील पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसे कर्नाटक लोकायुक्त के रजिस्ट्रार ने दायर किया था। यह अपील 16 अक्टूबर 2024 को दिए गए एकल न्यायाधीश के फैसले के खिलाफ दायर की गई थी।
एकल न्यायाधीश ने अपने फैसले में कर्नाटक इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (केईबी) आचरण, अनुशासन और अपील नियमावली के नियम 14-A को असंवैधानिक करार दिया था। उनका मानना था कि जब किसी कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले की जांच लोकायुक्त के पुलिस प्रकोष्ठ द्वारा की जाती है और बाद में उसी संस्था के जांच प्रकोष्ठ को विभागीय जांच भी सौंप दी जाती है, तो इससे कर्मचारी के खिलाफ “अनिवार्य पक्षपात” की स्थिति बन सकती है।
और पढ़ें: महाराष्ट्र के कई शहरों में तापमान 40 डिग्री पार, 17 मार्च से बारिश और आंधी की संभावना
एकल न्यायाधीश ने कहा था कि ऐसी व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 यानी समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है।
हालांकि, अब खंडपीठ ने इस फैसले को पलटते हुए कहा कि संबंधित नियम को असंवैधानिक नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में निष्पक्ष जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए लोकायुक्त की भूमिका महत्वपूर्ण है।
इस फैसले के साथ ही केपीटीसीएल के कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में लोकायुक्त द्वारा जांच और विभागीय कार्रवाई का रास्ता फिर से साफ हो गया है।
और पढ़ें: सबरीमाला मंदिर पर केरल सरकार का यू-टर्न: 50 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर रोक का समर्थन