कोलकाता के टंगरा इलाके की संकरी और भीड़भाड़ वाली गलियों के बीच स्थित एक खुले परिसर के भारी लोहे के फाटक पर उकेरे गए फीके बैंगनी रंग के चीनी अक्षर आज भी अतीत की कहानी कहते हैं। इन अक्षरों में लिखा है—‘पेई मेई चाइनीज़ स्कूल’। कभी यह स्कूल कोलकाता के चीनी समुदाय की सांस्कृतिक विरासत, शिक्षा और जिजीविषा का प्रतीक हुआ करता था, लेकिन आज इसकी पहचान एक सुरक्षा चौकी के रूप में सिमटकर रह गई है।
फाटक के भीतर झांकने पर जो दृश्य दिखता है, वह बीते दौर की यादों से बिल्कुल अलग है। तीन मंज़िला सफेद रंग की पेई मेई चाइनीज़ स्कूल की इमारत अब बच्चों की चहलकदमी, गलियारों में गूंजती हंसी या आंगन में खेलते विद्यार्थियों से भरी नहीं रहती। इसके बजाय, यहां सूखने के लिए टंगी बनियानों और सैन्य वर्दियों की कतारें दिखाई देती हैं, जो पिछले 18 महीनों से यहां रह रहे 150 से 200 केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के जवानों की मौजूदगी का संकेत देती हैं।
दरअसल, आर. जी. कर आंदोलन के बाद अदालत के आदेश के तहत स्कूल प्रशासन को सीआईएसएफ के लिए अपने दरवाज़े खोलने पड़े थे। अब स्कूल प्रबंधन ने इमारत को वापस पाने के लिए हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है। यह कानूनी लड़ाई सिर्फ एक भवन को वापस लेने की नहीं है, बल्कि कोलकाता के चाइनाटाउन में धीरे-धीरे सिमटते चीनी समुदाय के अस्तित्व और पहचान की भी लड़ाई बन गई है।
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पेई मेई चाइनीज़ स्कूल कभी इस इलाके में शिक्षा और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र था। आज, जब इसकी कक्षाएं खाली हैं और आंगन में बच्चों की जगह सुरक्षा बलों की मौजूदगी है, तो यह दृश्य बताता है कि कैसे समय के साथ एक पूरा समुदाय हाशिये पर चला गया है। यह संघर्ष न सिर्फ एक इमारत को वापस पाने का प्रयास है, बल्कि एक विरासत को बचाने की कोशिश भी है।
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