भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी क्रीमी लेयर के निर्धारण में आय मानदंड से जुड़े अपने 11 मार्च के फैसले पर केंद्र सरकार की ओर से दायर स्पष्टीकरण याचिका पर विचार करने के लिए पीठ गठित करने की संभावना जताई है।
केंद्र सरकार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के मार्च में दिए गए फैसले को पुराने मामलों पर पूर्वव्यापी रूप से लागू करना बेहद कठिन होगा। सरकार के अनुसार, ऐसा करने से वर्ष 2012 से अब तक तय हो चुके सरकारी सेवा मामलों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है और इसका असर केवल ओबीसी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अनारक्षित वर्ग समेत सभी श्रेणियों पर पड़ सकता है।
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग यानी डीओपीटी ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कई याचिकाओं के जरिए अपनी चिंताएं रखी हैं। सरकार ने कहा है कि यदि रोहित नाथन फैसले को पूर्वव्यापी तरीके से लागू किया गया, तो बड़ी संख्या में लोग पुराने भर्ती, परीक्षा और प्रवेश मामलों को चुनौती दे सकते हैं।
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सरकार के अनुसार, ऐसे लोग भी कानूनी दावे कर सकते हैं जिन्हें पहले गैर-क्रीमी लेयर प्रमाणपत्र नहीं दिया गया था। इसके अलावा वे लोग भी पुराने निर्णयों को चुनौती दे सकते हैं, जिन्होंने भर्ती, परीक्षा या शैक्षणिक प्रवेश के समय प्रमाणपत्र के लिए संबंधित अधिकारियों से संपर्क ही नहीं किया था।
क्या है पूरा विवाद?
ओबीसी आरक्षण व्यवस्था में क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने के लिए आय और संपत्ति से जुड़े मानदंड लागू किए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट के मार्च के फैसले में इसी आय परीक्षण से जुड़े पहलुओं पर महत्वपूर्ण सवाल उठे थे।
केंद्र का कहना है कि फैसले को पीछे की तारीख से लागू करने पर वर्षों से अंतिम रूप ले चुके नियुक्ति और प्रवेश संबंधी मामलों में बड़े पैमाने पर विवाद खड़ा हो सकता है।
अब सुप्रीम कोर्ट केंद्र की मांग पर विचार करेगा। पीठ के गठन और आगे होने वाली सुनवाई से यह स्पष्ट हो सकेगा कि फैसले को किस तरह लागू किया जाए और पुराने मामलों पर इसका कितना प्रभाव पड़ेगा।
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