पोलियो जैसी गंभीर बीमारी से खुद प्रभावित होने के बावजूद एक महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने पिछले 20 वर्षों से हजारों बच्चों को इस बीमारी से बचाने का संकल्प निभाया है। मितानिन के रूप में काम कर रही यह महिला घर-घर जाकर लोगों को पोलियो टीकाकरण के प्रति जागरूक कर रही हैं और बच्चों को इस संक्रामक वायरल बीमारी से सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभा रही हैं।
उन्होंने बताया कि जब उन्होंने मितानिन के रूप में काम शुरू किया, तभी उन्होंने एक लक्ष्य तय कर लिया था कि कोई भी बच्चा वह दर्द न झेले, जिससे वह खुद गुजरी हैं। पोलियो के कारण वह स्वयं दिव्यांग हो गईं और उन्हें पता है कि शारीरिक अक्षमता के साथ जीवन जीना कितना चुनौतीपूर्ण होता है।
मितानिन ने कहा कि बचपन किसी तरह गुजर जाता है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ दिव्यांग व्यक्ति को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसी अनुभव ने उन्हें समाज के अन्य बच्चों को पोलियो से बचाने के लिए प्रेरित किया।
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पिछले दो दशकों से वह नियमित रूप से अपने क्षेत्र के घरों में जाकर बच्चों के टीकाकरण की जानकारी जुटाती हैं, अभिभावकों को पोलियो की गंभीरता समझाती हैं और स्वास्थ्य विभाग के अभियानों में सक्रिय भागीदारी निभाती हैं।
उनके प्रयासों का उद्देश्य केवल पोलियो उन्मूलन तक सीमित नहीं है, बल्कि वह लोगों में स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाने का भी काम कर रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने में मितानिन जैसी कार्यकर्ताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
पोलियो एक संक्रामक वायरल बीमारी है, जो मुख्य रूप से छोटे बच्चों को प्रभावित करती है और कई मामलों में स्थायी दिव्यांगता का कारण बन सकती है। टीकाकरण को इससे बचाव का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है।
इस मितानिन की कहानी यह संदेश देती है कि व्यक्तिगत कठिनाइयों के बावजूद समाज के लिए समर्पण और सेवा की भावना बड़े बदलाव ला सकती है। उनके लगातार प्रयासों ने कई परिवारों को जागरूक किया और बच्चों को सुरक्षित भविष्य देने में मदद की है।
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