पंजाब कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर लंबे समय से चल रही खींचतान ने पार्टी के भीतर गुटबाजी को उजागर कर दिया है। इस पूरे विवाद में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और पंजाब कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल भी राजनीतिक संकट में घिर गए। जब 2025 की शुरुआत में उन्हें पंजाब का प्रभारी बनाया गया था, तब उन्होंने कथित तौर पर पार्टी नेतृत्व से राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की संभावनाओं के बारे में पूछा था। हालांकि, उन्हें यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया गया।
उस समय राजा वड़िंग प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे, जबकि प्रताप सिंह बाजवा विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता थे। दोनों एक ही जातीय पृष्ठभूमि से आते हैं। इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को हिमाचल प्रदेश का प्रभारी महासचिव बनाने का प्रस्ताव दिया गया, लेकिन उन्होंने पंजाब में ही काम करने की इच्छा जताई।
‘राजा हटाओ’ अभियान से बढ़ा विवाद
इस साल पंजाब कांग्रेस में अंतर्कलह तेज हुई। कई नेताओं ने हाईकमान से चन्नी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की मांग की। मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने वरिष्ठ नेताओं से कई दौर की बातचीत की और सार्वजनिक बयानबाजी से बचने को कहा। अजय माकन की अध्यक्षता में गठित समिति ने भी चन्नी के पक्ष में राय दिए जाने की बात सामने आई।
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लेकिन 1 जुलाई को कांग्रेस ने राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने का फैसला किया और चन्नी को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाया। इससे चन्नी के साथ सुखजिंदर सिंह रंधावा, परगट सिंह, राणा गुरजीत और विजय इंदर सिंगला जैसे नेता भी नाराज हुए।
बघेल ने असंतुष्ट नेताओं को मनाने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए। बाद में पंजाब दौरे के दौरान उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा और कुछ स्थानों पर ‘बघेल वापस जाओ’ के पोस्टर लगाए गए।
सिंगला के नाम पर भी बदला समीकरण
कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, जून में विजय इंदर सिंगला को प्रदेश अध्यक्ष बनाने पर सहमति बन गई थी। हालांकि, अंतिम समय में चन्नी ने खुद इस पद के लिए दावेदारी पेश कर दी। इससे हाईकमान को लगा कि राजा विरोधी गुट एकजुट नहीं है।
चन्नी को सर्वे में बढ़त मिलने के बावजूद नेतृत्व नहीं मिला। सूत्रों का कहना है कि उनका दलित चेहरा उनके पक्ष और विपक्ष दोनों में काम करता है। पिछले विधानसभा चुनाव में वह दोनों सीटों से हार गए थे। बाद में जालंधर लोकसभा सीट से जीतकर उन्होंने वापसी की।
कांग्रेस नेतृत्व को उनका हिमाचल प्रस्ताव ठुकराना और प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए कथित लॉबिंग भी पसंद नहीं आई। हालांकि, पार्टी ने उनके प्रभाव को देखते हुए उन्हें चुनाव अभियान समिति की जिम्मेदारी दी।
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