सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर आधारित एनसीईआरटी की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक पर पूर्ण और तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया है। अदालत ने स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव और एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अदालत को सूचित किया कि ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ विषयक अध्याय तैयार करने वाले व्यक्तियों को भविष्य में यूजीसी या किसी मंत्रालय के साथ कार्य नहीं करने दिया जाएगा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्वत: संज्ञान मामले में बिना शर्त माफी भी पेश की।
हालांकि, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि नोटिस में माफी का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की सामग्री से छात्रों और समाज में न्यायपालिका के प्रति गलत संदेश जा सकता है। अदालत ने इसे गंभीर मामला बताते हुए कहा कि इससे न्यायिक संस्थानों की साख प्रभावित हो सकती है।
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विवादित अध्याय में न्यायपालिका के समक्ष लंबित मामलों की भारी संख्या, न्यायाधीशों की कमी और भ्रष्टाचार जैसी चुनौतियों का उल्लेख किया गया था। पुस्तक के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में लगभग 81,000 मामले, उच्च न्यायालयों में 62.40 लाख और निचली अदालतों में 4.70 करोड़ मामले लंबित हैं।
यह भी कहा गया कि न्यायाधीश आचार संहिता से बंधे होते हैं और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। फिलहाल मामले की अगली सुनवाई तक पुस्तक की पहुंच पर पूर्ण रोक रहेगी।
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