सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अविवाहित वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र पर सवाल उठाने का कारण नहीं बन सकते। यह टिप्पणी अदालत ने एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल अभ्यर्थी की नियुक्ति को इसी आधार पर रोक दिया गया था।
यह मामला तब सामने आया जब एक उम्मीदवार पर आरोप लगाया गया कि उसके विवाह पूर्व संबंधों के कारण उसकी नैतिकता और चरित्र पर सवाल उठता है, और इसी वजह से उसकी नियुक्ति प्रक्रिया रोक दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को अस्वीकार करते हुए कहा कि वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों को चरित्र हनन का आधार नहीं बनाया जा सकता।
न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा संविधान द्वारा संरक्षित मौलिक अधिकार हैं, और किसी भी व्यक्ति के निजी जीवन को अनावश्यक रूप से सार्वजनिक मूल्यांकन का विषय नहीं बनाया जा सकता।
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अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल सहमति से बने संबंधों के आधार पर किसी की योग्यता या नैतिकता पर प्रश्न उठाना न्यायसंगत नहीं है। यह निर्णय विशेष रूप से उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहां रोजगार या सार्वजनिक सेवाओं में चयन के दौरान व्यक्तिगत जीवन को आधार बनाया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गोपनीयता के अधिकार को और मजबूत करता है। इससे भविष्य में ऐसे मामलों में स्पष्ट कानूनी दिशा मिलेगी, जहां निजी संबंधों के आधार पर किसी व्यक्ति के करियर पर असर डाला जाता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सामाजिक और कानूनी दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो आधुनिक समाज में व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा को और सशक्त बनाता है।
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