दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते दुष्कर्म और यौन अपराधों के मामलों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को अपराध रोकने के लिए प्रभावी और जमीनी स्तर पर पुलिसिंग मजबूत करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि संभावित अपराधियों के मन में कानून और सजा का डर पैदा करना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक अपराध करने की प्रवृत्ति रखने वाले असामाजिक तत्वों को कानूनी कार्रवाई और सजा का भय नहीं होगा, तब तक ऐसे अपराधों की रोकथाम मुश्किल रहेगी। अदालत ने पुलिस से ऐसी व्यवस्था विकसित करने को कहा, जिससे अपराध होने से पहले ही संभावित अपराधी पुलिस कार्रवाई के परिणामों से डरें। पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी भी सभ्य समाज में दुष्कर्म स्वीकार्य नहीं हो सकता और इसे रोकने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।
कागजी योजनाओं से नहीं चलेगा काम
अदालत ने कहा कि केवल कागजों पर योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है। दिल्ली पुलिस को जमीनी स्तर पर काम करना होगा और अपराध रोकने के लिए जरूरत पड़ने पर कड़े कदम उठाने से पीछे नहीं हटना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि लोग अनुच्छेद 21 का हवाला देकर सवाल उठा सकते हैं, लेकिन पुलिस को हर परिस्थिति में अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
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भर्ती और प्रशिक्षण पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस बल में पर्याप्त संख्या में कर्मचारी नहीं हैं तो नई भर्ती की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। साथ ही पुलिसकर्मियों को उचित प्रशिक्षण देने पर भी जोर दिया गया। अदालत ने माना कि इन उपायों को पूरी तरह लागू करने में समय लगेगा, लेकिन तब तक अपराध रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने होंगे।
रात-दिन निगरानी और बेहतर रोशनी
अदालत ने दिल्ली-एनसीआर में दिन-रात कड़ी निगरानी की जरूरत बताई और अधिकारियों की जवाबदेही तय करने को कहा। 2012 के निर्भया मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने बिना अनुमति चल रहे भोजनालयों और वहां शराब परोसे जाने की निगरानी पर भी जोर दिया। साथ ही दिल्ली के पार्कों और सार्वजनिक स्थानों पर पर्याप्त रोशनी सुनिश्चित करने की बात कही।
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