सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (19 जनवरी 2026) को लखनऊ के एक वकील की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि अक्टूबर 2023 में उनके खिलाफ खुले न्यायालय में घोषित ₹25,000 के बजाय ₹5 लाख का जुर्माना लगाया गया। वकील ने इस जुर्माने को “फर्जी” जनहित याचिका (PIL) दाखिल करने के लिए अनुचित बताया था।
यह मामला वकील अशोक पांडे द्वारा दायर की गई उस जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसे 13 अक्टूबर 2023 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ (अब सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता वाली पीठ ने खारिज कर दिया था। याचिका में मांग की गई थी कि न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय, जो वर्तमान में दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हैं, को बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में दोबारा शपथ दिलाई जाए, क्योंकि कथित तौर पर शपथ संविधान के अनुसार नहीं ली गई थी।
याचिकाकर्ता का दावा था कि खुले कोर्ट में उस समय उन पर ₹25,000 का जुर्माना लगाया गया था, लेकिन बाद में आदेश में ₹5 लाख की राशि दर्ज पाई गई। उन्होंने कहा कि अब जिला कलेक्टर इस राशि की वसूली की कार्रवाई कर रहे हैं।
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इस पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने स्पष्ट कहा, “हम लिखित आदेश के अनुसार ही चलेंगे और उसमें ₹5 लाख का जुर्माना दर्ज है।” पीठ ने आदेश में संशोधन या जांच की मांग को सिरे से खारिज कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की याचिकाएं केवल “पब्लिसिटी के लिए” दाखिल की जाती हैं। कोर्ट ने दोहराया कि ऐसी फर्जी जनहित याचिकाएं न्यायालय का कीमती समय बर्बाद करती हैं और गंभीर मामलों से ध्यान भटकाती हैं। पीठ ने यह भी कहा कि अब समय आ गया है कि इस तरह की याचिकाओं पर सख्त जुर्माना लगाया जाए।
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