सुप्रीम कोर्ट ने अवैध रूप से निजी संस्थाओं को आवंटित आरक्षित वन भूमि की पहचान कर उसे वन विभाग को वापस सौंपने संबंधी अपने देशव्यापी निर्देशों को वापस लेने से इनकार कर दिया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने 18 अगस्त को रिची रिच कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी की क्यूरेटिव याचिका खारिज कर दी।
यह मामला महाराष्ट्र के पुणे स्थित कोंढवा बुद्रुक गांव की 11.89 हेक्टेयर भूमि से जुड़ा है। अक्टूबर 1999 में यह भूमि रिची रिच कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी को आवंटित की गई थी, जबकि यह आरक्षित वन क्षेत्र में आती थी। शीर्ष अदालत ने मई 2025 के अपने फैसले में इस आवंटन को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया था।
पीठ में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन भी शामिल थे। अदालत ने कहा कि क्यूरेटिव याचिका स्वीकार करने का कोई आधार नहीं बनता। इससे पहले अगस्त 2025 में सोसायटी की पुनर्विचार याचिका भी खारिज हो चुकी थी।
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मई 2025 के फैसले में अदालत ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासकों को विशेष जांच दल गठित करने का निर्देश दिया था। इन दलों को यह पता लगाना था कि राजस्व विभाग के कब्जे वाली आरक्षित वन भूमि कहीं गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए निजी व्यक्तियों या संस्थाओं को तो आवंटित नहीं की गई।
अदालत ने ऐसी भूमि वापस लेकर वन विभाग को सौंपने का निर्देश दिया था। यदि भूमि वापस लेना जनहित में उचित न हो, तो राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों को उसकी लागत संबंधित लाभार्थियों से वसूल कर वन विकास में लगाने को कहा गया था।
अदालत ने टिप्पणी की थी कि यह मामला राजनीतिक नेताओं, नौकरशाहों और बिल्डरों के गठजोड़ से बहुमूल्य वन भूमि को व्यावसायिक उपयोग में बदलने का उदाहरण है। साथ ही, अदालत ने रिची रिच सोसायटी को दी गई पर्यावरणीय मंजूरी भी रद्द कर दी थी और भूमि तीन महीने के भीतर वन विभाग को सौंपने का आदेश दिया था।
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