लोक सेवकों के खिलाफ जांच या जांच प्रक्रिया शुरू करने से पहले अनुमति अनिवार्य करने वाले कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को विभाजित फैसला सुनाया। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A की संवैधानिक वैधता को लेकर न्यायालय के दो न्यायाधीशों की राय अलग-अलग रही, जिसके चलते मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया गया है।
धारा 17A, जिसे जुलाई 2018 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में जोड़ा गया था, यह प्रावधान करती है कि किसी लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान लिए गए निर्णय या दी गई सिफारिशों के संबंध में सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति के बिना कोई “जांच या अन्वेषण” नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने अपने फैसले में इस प्रावधान को असंवैधानिक बताया। उन्होंने कहा कि यह धारा भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देती है और ईमानदार अफसरों की रक्षा के बजाय भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। उन्होंने कहा कि यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है क्योंकि यह बिना किसी तार्किक आधार के एक विशेष वर्ग के अधिकारियों को संरक्षण देता है। न्यायमूर्ति नागरत्ना के अनुसार, यह कानून पहले ही निरस्त किए जा चुके प्रावधानों को नए रूप में पुनर्जीवित करने का प्रयास है।
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उन्होंने यह भी कहा कि पूर्व अनुमति की शर्त जांच की प्रक्रिया को रोक देती है और इससे नीति-निर्माण में कोई पंगुता नहीं आएगी यदि जांच के बाद निर्णय लिए जाएं।
वहीं, न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन ने इस राय से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि धारा 17A को पूरी तरह निरस्त करना “बीमारी से भी खतरनाक इलाज” होगा। हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जांच की अनुमति किसी स्वतंत्र संस्था द्वारा दी जानी चाहिए। इसलिए उन्होंने निर्देश दिया कि यह अनुमति लोकपाल या राज्य लोकायुक्त द्वारा तय की जाए। इस शर्त के साथ उन्होंने धारा 17A को संवैधानिक रूप से वैध माना।
यह विभाजित फैसला ‘सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन’ (CPIL) द्वारा दायर जनहित याचिका पर आया है। अब यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष रखा जाएगा, जो इस पर निर्णय के लिए एक बड़ी पीठ का गठन करेंगे।
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