भारत बेहद चुनौतीपूर्ण अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बीच ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहा है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, यूक्रेन युद्ध और वैश्विक व्यापार तनाव के बीच सम्मेलन की सफलता भारत के लिए बड़ी जिम्मेदारी है।
ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका। भारत, रूस, चीन और अन्य देशों की कोशिशों के बावजूद ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के रुख में सहमति नहीं बन पाई। अब दिल्ली शिखर सम्मेलन में दोनों पक्षों के बीच ऐसा समझौता कराने की चुनौती है, जिसे सभी सदस्य स्वीकार कर सकें।
पश्चिम एशिया संघर्ष का प्रभाव वैश्विक स्तर पर पड़ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य का खुला रहना खाड़ी देशों और पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है। भारत के भी इस क्षेत्र में व्यापक हित हैं। ऐसे में भारत की कोशिश होगी कि दिल्ली घोषणा पर सभी पैराग्राफ में सर्वसम्मति बने और किसी सदस्य की आपत्ति दर्ज न हो।
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रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था को चुनौती दी है। टैरिफ को हथियार की तरह इस्तेमाल करना, तेल बाजार पर प्रभाव बढ़ाने की कोशिश और ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जैसी नीतियों ने अमेरिका के कई सहयोगियों के साथ भी दूरी बढ़ाई है। इससे अमेरिकी दबदबे से संतुलन बनाने की इच्छा रखने वाले देशों के बीच ब्रिक्स का महत्व बढ़ रहा है।
ट्रंप ब्रिक्स को अमेरिका विरोधी समूह मानते हैं और डी-डॉलराइजेशन की दिशा में आगे बढ़ने पर सदस्य देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दे चुके हैं। हालांकि ब्रिक्स का औपचारिक एजेंडा डॉलर को खत्म करना नहीं है। समूह सदस्य देशों के बीच राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है।
भारत के लिए ब्रिक्स रणनीतिक स्वायत्तता का महत्वपूर्ण मंच है। इससे भारत पश्चिमी देशों के साथ मजबूत संबंध रखते हुए रूस, चीन और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भी सहयोग बढ़ा सकता है।
शी चिनफिंग की सात साल बाद भारत यात्रा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी संभावित द्विपक्षीय बातचीत और व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी सम्मेलन को विशेष महत्व देगी। मोदी-पुतिन-शी की अनौपचारिक मुलाकात भी बड़ा कूटनीतिक संदेश दे सकती है।
ब्रिक्स अभी पूरी तरह एकजुट समूह नहीं है और इसे आंतरिक मतभेदों, चीन के बढ़ते प्रभाव तथा भारत-चीन तनाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। फिर भी व्यापार, तकनीक, नई आपूर्ति श्रृंखलाओं, कनेक्टिविटी और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे में सहयोग की बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं।
निष्कर्ष है कि ब्रिक्स की असली ताकत तत्काल किसी नई विश्व व्यवस्था का विकल्प बनने में नहीं, बल्कि समय के साथ साझा हितों को ठोस सहयोग में बदलने की क्षमता में है।
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