सुप्रीम कोर्ट ने 2,000 रुपये से अधिक के कुछ यूपीआई भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने के केंद्र सरकार के फैसले पर फिलहाल रोक लगाने से इनकार कर दिया है। हालांकि, अदालत ने मामले में केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और यूपीआई स्टीयरिंग कमेटी को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यह मुद्दा कानूनी से अधिक तकनीकी प्रकृति का है।
केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमन ने पीठ को बताया कि भुगतान प्रणाली का इस्तेमाल करने वाले 96 प्रतिशत लोग प्रस्तावित शुल्क से मुक्त हैं।
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यह याचिका अधिवक्ता अंजन दत्ता ने दायर की है। इसमें 14 सितंबर की केंद्र सरकार की अधिसूचना और 15 सितंबर को घोषित MDR व्यवस्था को चुनौती दी गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि शुल्क व्यवस्था पर्याप्त कानूनी सुरक्षा, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना लागू की गई।
याचिकाकर्ता ने यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड भुगतान के बीच अंतर पर भी सवाल उठाया है। उनका कहना है कि अधिसूचना रुपे डेबिट कार्ड के लिए बिना किसी मौद्रिक सीमा के शुल्क-मुक्त व्यवस्था जारी रखती है।
सरकार ने 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से अधिक के व्यापारिक यूपीआई भुगतान पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लागू करने का फैसला किया है। हालांकि, व्यक्ति-से-व्यक्ति भुगतान और छोटे लेनदेन शुल्क से बाहर रहेंगे।
75,000 रुपये या उससे अधिक के भुगतान पर MDR की अधिकतम सीमा 300 रुपये होगी। रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट जैसे आवश्यक क्षेत्रों में 2,000 रुपये से अधिक के प्रत्येक लेनदेन पर पांच रुपये का फ्लैट MDR लगेगा।
म्यूचुअल फंड, प्रतिभूति और स्टॉकब्रोकर भुगतान पर 0.02 प्रतिशत MDR होगा, जिसकी अधिकतम सीमा 300 रुपये है। व्यक्ति-से-व्यक्ति भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लगेगा।
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