दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक दोहरे हत्याकांड मामले में आरोपी महिला को नियमित जमानत दे दी है। अदालत ने कहा कि मुकदमे की सुनवाई में काफी लंबा समय लगने की संभावना है और ऐसे में तीन साल से अधिक समय से विचाराधीन कैदी के रूप में उसकी निरंतर हिरासत को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
न्यायमूर्ति की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की कि आरोपी महिला लंबे समय से जेल में बंद है और मुकदमे की प्रक्रिया अभी प्रारंभिक चरण में ही है। अदालत ने यह भी कहा कि विचाराधीन कैदियों के अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब ट्रायल में देरी हो रही हो।
मामला एक कथित साजिश से जुड़ा है जिसमें महिला पर अपने पति की हत्या की योजना में शामिल होने का आरोप लगाया गया था। जांच एजेंसियों के अनुसार, यह मामला गंभीर आपराधिक साजिश और हत्या से संबंधित है।
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हालांकि, अदालत ने पाया कि आरोपी महिला पिछले तीन वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद है और मुकदमे की गति काफी धीमी है। इसी आधार पर अदालत ने माना कि आगे की हिरासत आवश्यक नहीं है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि न्याय प्रणाली में यह संतुलन जरूरी है कि एक तरफ अपराध की गंभीरता हो और दूसरी तरफ आरोपी के मौलिक अधिकारों का संरक्षण भी सुनिश्चित किया जाए।
इस फैसले को कानूनी विशेषज्ञों द्वारा विचाराधीन कैदियों के अधिकारों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत का मतलब आरोपों से मुक्ति नहीं है, बल्कि यह केवल कानूनी प्रक्रिया के दौरान स्वतंत्रता देने का एक उपाय है।
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