भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) की प्रथम समिति में परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए एक वैश्विक, गैर-भेदभावपूर्ण और सत्यापन योग्य ढांचे की मांग दोहराई है। इसके साथ ही भारत ने जोर देकर कहा कि रक्षा प्रणालियों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते इस्तेमाल के बीच परमाणु हथियारों के प्रयोग का निर्णय मानवीय नियंत्रण में ही रहना चाहिए।
यूएनजीए की प्रथम समिति में परमाणु हथियार समूह के तहत भारत का आधिकारिक बयान देते हुए कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने परमाणु शस्त्रागार से जुड़े तकनीकी और परिचालन संबंधी खतरों, विशेष रूप से परमाणु कमान और नियंत्रण प्रणालियों में उभरती तकनीकों के इस्तेमाल से उत्पन्न जोखिमों को रेखांकित किया। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन ने तिवारी की इस टिप्पणी को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर साझा करते हुए वैश्विक परमाणु निरस्त्रीकरण और अंतरराष्ट्रीय अप्रसार व्यवस्था को मजबूत करने के प्रति नई दिल्ली की प्रतिबद्धता दोहराई।
तिवारी ने कहा, "भारत स्वीकार करता है कि परमाणु कमान और नियंत्रण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल वास्तविक सवाल खड़े करता है। हम इस सिद्धांत का समर्थन करते हैं कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का फैसला इंसानों द्वारा ही लिया जाना चाहिए।"
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भारत के मूल रक्षा सिद्धांत को दोहराते हुए तिवारी ने कहा कि नई दिल्ली की रणनीतिक क्षमताएं विशुद्ध रूप से रक्षात्मक हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा स्थितियों से आकार लेती हैं, न कि किसी एक देश को निशाना बनाकर। उन्होंने कहा, "एक जिम्मेदार परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र के रूप में भारत विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध की नीति अपनाता है, जिसमें पहले इस्तेमाल न करने और गैर-परमाणु हथियार संपन्न देशों के खिलाफ इस्तेमाल न करने की नीति शामिल है। हम इन प्रतिबद्धताओं को बहुपक्षीय कानूनी व्यवस्थाओं में बदलने के लिए तैयार हैं। भारत की क्षमताएं हमारे विशिष्ट सुरक्षा परिवेश से आकार लेती हैं और किसी विशेष पक्ष के खिलाफ निर्देशित नहीं हैं।"
भारत ने परमाणु परीक्षण पर स्वैच्छिक एकतरफा स्थगन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। तिवारी ने गैर-परमाणु देशों की सुरक्षा के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी नकारात्मक सुरक्षा आश्वासनों की वकालत करते हुए कहा कि ऐसे आश्वासन इन देशों की असुरक्षा की भावना को कम करेंगे और अप्रसार व्यवस्था को मजबूत करेंगे, जिससे वैश्विक स्तर पर परमाणु खतरा कम होगा।
तिवारी ने भारत के 2006 के कार्यपत्र और 2007 में निरस्त्रीकरण सम्मेलन में दस्तावेज सीडी/1816 का हवाला देते हुए चरणबद्ध प्रक्रिया के माध्यम से सार्वभौमिक, गैर-भेदभावपूर्ण, बहुपक्षीय ढांचे पर आधारित निरस्त्रीकरण की वकालत की।
उन्होंने भारत द्वारा प्रथम समिति में पेश किए जाने वाले दो प्रस्तावों का भी उल्लेख किया - 1998 से पेश "परमाणु खतरा कम करना" प्रस्ताव, जो परमाणु हथियारों की "हेयर-ट्रिगर अलर्ट स्थिति" को कम करने का आह्वान करता है, और 1992 से पेश "परमाणु हथियारों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध संबंधी कन्वेंशन" प्रस्ताव, जो निरस्त्रीकरण सम्मेलन से परमाणु हथियारों के इस्तेमाल या इस्तेमाल की धमकी पर प्रतिबंध लगाने वाले अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन पर बातचीत करने का आह्वान करता है।
भारत ने स्पष्ट किया कि परमाणु हथियार निषेध संधि (टीपीएनडब्ल्यू) उस पर कोई कानूनी बाध्यता नहीं डालती, लेकिन वैश्विक निरस्त्रीकरण और अप्रसार मजबूती के प्रति उसकी प्रतिबद्धता अपरिवर्तित है। तिवारी ने आतंकवादियों और गैर-राज्य तत्वों को परमाणु हथियारों, सामग्री और तकनीक तक पहुंच से रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर भी बल दिया।
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