कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रंका को सात दिन की न्यायिक हिरासत के बाद बुधवार को जमानत मिल गई। दोनों नेताओं को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (एसईएम) के समक्ष पेश किया गया था। मामले की सुनवाई के बाद मजिस्ट्रेट ने पहले फैसला सुरक्षित रखा और फिर दोनों को रिहा करने का आदेश दिया। हालांकि, आवश्यक कागजी कार्रवाई लंबित होने के कारण तिहाड़ जेल से उनकी रिहाई में देरी होने की आशंका है।
दिल्ली पुलिस ने दोनों नेताओं की न्यायिक हिरासत तीन दिन और बढ़ाने की मांग की थी, लेकिन मजिस्ट्रेट ने उनकी रिहाई का आदेश दिया।
यह घटनाक्रम दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा उनकी हिरासत के मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार करने के कुछ घंटे बाद सामने आया। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने याचिकाकर्ताओं को अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति दी। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका, शांति बनाए रखने के लिए दिए गए बांड के कथित उल्लंघन से जुड़े दोहराए गए मामले में उचित उपाय नहीं है।
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अदालत ने सीजेपी के सह-संयोजकों से पहले विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष अपनी शिकायतें रखने को कहा। मजिस्ट्रेट के फैसले से असंतुष्ट रहने पर वे अपीलीय अदालत का रुख कर सकते हैं। दशहरा अवकाश के बावजूद उच्च न्यायालय ने इस मामले की तत्काल सुनवाई की।
कैसे बढ़ी न्यायिक हिरासत?
सौरव दास और आशुतोष रंका को 13 अक्टूबर को हिरासत में लिया गया था। इसके बाद 14 अक्टूबर को उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया। 19 अक्टूबर को उनकी हिरासत दो दिन और बढ़ा दी गई थी, जिसकी अवधि बुधवार को समाप्त होनी थी।
वकील ने मजिस्ट्रेट के अधिकार पर उठाए सवाल
दोनों नेताओं की ओर से पेश अधिवक्ता अभिक चिमनी ने दलील दी कि उनके मुवक्किलों को निजी मुचलके पर रिहा किया जाना चाहिए। उन्होंने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के न्यायिक हिरासत बढ़ाने के अधिकार और जमानत के लिए जमानतदार पेश करने की कानूनी अनिवार्यता पर सवाल उठाए।
सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने बताया कि नए जमानतदार पेश करने से संबंधित मामला मजिस्ट्रेट के समक्ष सूचीबद्ध था।
क्यों हिरासत में लिए गए थे नेता?
सौरव दास और आशुतोष रंका को 13 अक्टूबर को अन्य सीजेपी कार्यकर्ताओं के साथ जंतर-मंतर पर कथित रूप से प्रवेश करने के बाद हिरासत में लिया गया था। उस समय जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया था। समूह ने राष्ट्रीय ध्वज प्रदर्शित किया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारे लगाए थे। पुलिस ने शांति बांड के कथित उल्लंघन के आरोप में दोनों नेताओं के खिलाफ निवारक कार्रवाई की थी।
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