अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में आ गई है। 6 मार्च को युद्ध के सातवें दिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए तेहरान से “बिना शर्त आत्मसमर्पण” की मांग की।
ट्रंप ने अपने संदेश में कहा कि ईरान के साथ किसी भी तरह का समझौता तभी संभव होगा जब वह पूरी तरह आत्मसमर्पण करे। उन्होंने यह भी कहा कि इसके बाद ईरान के लिए एक “स्वीकार्य और मजबूत नेतृत्व” चुना जाएगा और देश को विनाश के कगार से वापस लाया जाएगा।
ट्रंप के बयान के तुरंत बाद इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने कड़ा जवाब देते हुए कहा कि ईरान “लंबे समय तक चलने वाले युद्ध” के लिए पूरी तरह तैयार है। युद्ध शुरू होने के बाद से IRGC को ईरान की सैन्य और रणनीतिक शक्ति का मुख्य स्तंभ माना जा रहा है।
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IRGC ईरान की सेना की एक विशिष्ट और शक्तिशाली शाखा है, जिसकी स्थापना 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद देश की राजनीतिक व्यवस्था और सुरक्षा की रक्षा के लिए की गई थी। यह संगठन न केवल सैन्य अभियानों में सक्रिय रहता है, बल्कि क्षेत्रीय रणनीति और विदेश नीति पर भी प्रभाव रखता है।
ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली लारीजानी भी पहले IRGC के सैनिक रह चुके हैं। बताया जाता है कि मौजूदा युद्ध के दौरान वे सेना और राजनीतिक नेतृत्व के बीच समन्वय की महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
वहीं ईरान के नए सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह मोजतबा खामेनेई का भी IRGC से पुराना संबंध रहा है। उन्होंने ईरान-इराक युद्ध के दौरान इस संगठन के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी थी।
8 फरवरी को जब खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता चुना गया, तब IRGC ने उनके प्रति अपनी निष्ठा की घोषणा की थी। मौजूदा संघर्ष में यह संगठन ईरान की सैन्य रणनीति और प्रतिरोध की सबसे अहम ताकत माना जा रहा है।
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