जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधान हटाए जाने की सातवीं वर्षगांठ पर जम्मू-कश्मीर मानवाधिकार फोरम ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट जारी करते हुए केंद्र सरकार से जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 को निरस्त करने की सिफारिश की है। फोरम का कहना है कि क्षेत्र में लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने और लोगों का विश्वास बहाल करने के लिए यह कदम आवश्यक है।
यह फोरम वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त किए जाने के बाद गठित किया गया था। वर्तमान में इसके सह-अध्यक्ष भारत सरकार के पूर्व गृह सचिव गोपाल पिल्लई और जम्मू-कश्मीर के लिए गठित वार्ताकार समूह की पूर्व सदस्य राधा कुमार हैं।
फोरम में न्यायपालिका, सुरक्षा और प्रशासनिक क्षेत्र की कई प्रतिष्ठित हस्तियां भी शामिल हैं। इनमें सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रूमा पाल, न्यायमूर्ति ए.पी. शाह, न्यायमूर्ति बिलाल नाज़की, न्यायमूर्ति हसनैन मसूदी, न्यायमूर्ति अंजना प्रकाश, सेवानिवृत्त मेजर जनरल अशोक मेहता, एयर वाइस मार्शल कपिल काक, लेफ्टिनेंट जनरल एच.एस. पनाग और कर्नल योगिंदर कंधारी जैसे सदस्य शामिल हैं।
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फोरम स्वयं को चिंतित नागरिकों का एक अनौपचारिक समूह बताता है, जिसका उद्देश्य जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में मानवाधिकारों की स्थिति पर निगरानी रखना और आवश्यक सुझाव देना है। अब तक फोरम सात वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित कर चुका है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले तीन दशकों से आतंकवाद और हिंसा से प्रभावित जम्मू-कश्मीर में स्थायी शांति और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए संवाद, जनभागीदारी और संवैधानिक संस्थाओं की बहाली जरूरी है। फोरम का मानना है कि राजनीतिक प्रक्रिया को मजबूत करने, नागरिक अधिकारों की रक्षा करने और लोगों का भरोसा जीतने के लिए केंद्र सरकार को व्यापक स्तर पर पहल करनी चाहिए।
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