एशिया के सबसे बड़े आदिवासी धार्मिक आयोजनों में से एक, सम्मक्का–सरलम्मा महा जातरा का शुभारंभ बुधवार (28 जनवरी 2026) की आधी रात के करीब मेदाराम आदिवासी तीर्थ स्थल पर देवी सरलम्मा के आगमन के साथ हुआ। बड़ी संख्या में श्रद्धालु, जिनमें बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग शामिल थे, देवी के आगमन का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। देवी सरलम्मा को नव विकसित मंच पर विधिवत स्थापित किया गया, जिसके साथ ही चार दिवसीय द्विवार्षिक महा जातरा की औपचारिक शुरुआत हो गई।
इस अवसर पर मेदाराम और आसपास के इलाकों में भारी श्रद्धालु उमड़ पड़े। परंपरागत आदिवासी रीति-रिवाजों, ढोल-नगाड़ों और जयकारों के बीच देवी सरलम्मा का स्वागत किया गया। श्रद्धालुओं ने देवी को सिंदूर, नारियल, गुड़ और अन्य पारंपरिक भोग अर्पित किए। प्रशासन द्वारा सुरक्षा और व्यवस्थाओं के पुख्ता इंतजाम किए गए थे, ताकि लाखों श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
इस महा जातरा का सबसे महत्वपूर्ण और पावन क्षण 29 जनवरी की रात माना जा रहा है, जब मां सम्मक्का के चिलकाला गुट्टा से सिंदूर से सजे संदूक (वर्मिलियन कास्केट) के रूप में आगमन की परंपरा है। इसी के साथ जातरा अपने चरम पर पहुंचती है। माना जाता है कि मां सम्मक्का और सरलम्मा आदिवासी समुदाय की रक्षा करने वाली देवी हैं और उनके दर्शन से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
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इस बार की जातरा कई मायनों में खास है, क्योंकि यह मंदिर परिसर के नवीनीकरण के बाद आयोजित होने वाली पहली द्विवार्षिक महा जातरा है। नए प्लेटफॉर्म, बेहतर सुविधाएं और विस्तारित परिसर ने आयोजन को और भी व्यवस्थित बनाया है। प्रशासन और मंदिर प्रबंधन को उम्मीद है कि इस बार पहले से भी अधिक श्रद्धालु मेदाराम पहुंचेंगे।
मेदाराम महा जातरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और सामूहिक एकता का भी भव्य प्रदर्शन है।
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