पाकिस्तान में एक अलग तरह की जेन Z बगावत देखने को मिल रही है, जो न तो सड़कों पर विरोध के रूप में सामने आई है और न ही हिंसा के ज़रिये, बल्कि उन विचारों के रूप में उभरी है जिन्हें दबाया नहीं जा सका। इस वैचारिक विद्रोह की चिंगारी बना एक लेख, जिसे एक युवा पाकिस्तानी अकादमिक ने लिखा था और जिसे कुछ ही घंटों में हटा दिया गया।
‘इट इज़ ओवर’ (It Is Over) शीर्षक वाला यह लेख जोरैन निज़ामानी ने लिखा था, जो अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ आर्कान्सस एट लिटिल रॉक से क्रिमिनोलॉजी में पीएचडी कर रहे हैं। यह लेख 1 जनवरी को पाकिस्तान के प्रमुख अख़बार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून में प्रकाशित हुआ था, लेकिन कथित तौर पर पाकिस्तानी सेना के दबाव में कुछ ही घंटों बाद हटा लिया गया।
लेख हटाए जाने के बाद सोशल मीडिया पर भारी नाराज़गी देखने को मिली। लोगों ने इसे खुले तौर पर सेंसरशिप बताया और जोरैन निज़ामानी को ‘राष्ट्रीय नायक’ तक कह दिया। लेख के स्क्रीनशॉट तेज़ी से वायरल हो गए। निज़ामानी मशहूर पाकिस्तानी कलाकार फज़ीला क़ाज़ी और क़ैसर ख़ान निज़ामानी के बेटे हैं।
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अपने लेख में निज़ामानी ने तर्क दिया कि पाकिस्तान के सत्ताधारी अभिजात वर्ग का युवाओं पर अब कोई प्रभाव नहीं रहा। उन्होंने लिखा कि देशभक्ति सिखाने के लिए आयोजित सरकारी भाषण, सेमिनार और अभियान अब बेअसर हो चुके हैं। बिना सेना का नाम लिए उन्होंने कहा कि देशभक्ति भाषणों या नारों से नहीं गढ़ी जा सकती, बल्कि समान अवसर, मज़बूत बुनियादी ढांचा, प्रभावी व्यवस्था और नागरिक अधिकारों से अपने आप पैदा होती है।
लेख में जेन Z और जेन अल्फा को राजनीतिक हकीकत से पूरी तरह वाक़िफ़ बताया गया है। इंटरनेट और सूचना तक आसान पहुंच ने सत्ता की सोच नियंत्रित करने की पारंपरिक कोशिशों को कमज़ोर कर दिया है। उन्होंने यह भी लिखा कि कई युवा बोलने से डरते हैं और इसलिए देश छोड़ना ही बेहतर समझते हैं।
लेख हटाए जाने पर राजनीतिक और मीडिया हलकों में तीखी प्रतिक्रिया हुई। इमरान ख़ान की पार्टी पीटीआई के कनाडाई विंग ने भी कहा कि यह घटना साबित करती है कि ज़बरदस्ती थोपी गई देशभक्ति अब काम नहीं करती।
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