करीब सात दशक तक सरकारी स्वामित्व में रहने वाली पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस (पीआईए) का आखिरकार निजीकरण कर दिया गया है। सरकार ने सार्वजनिक नीलामी के जरिए लगभग 13,500 करोड़ पाकिस्तानी रुपये में एयरलाइन को निजी क्षेत्र के एक कंसोर्टियम को बेच दिया। यह पीआईए के निजीकरण का दूसरा प्रयास था, क्योंकि इससे पहले सरकार को पर्याप्त बोली नहीं मिल सकी थी।
नीलामी में कराची स्थित ब्रोकरेज कंपनी आरिफ हबीब लिमिटेड (एएचएल) के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम ने सबसे ऊंची बोली लगाई। इस समूह में एकेडी ग्रुप होल्डिंग्स, फातिमा फर्टिलाइज़र, सिटी स्कूल्स, लेक सिटी होल्डिंग्स और फौजी फर्टिलाइज़र कंपनी (एफएफसी) शामिल हैं। विशेष रूप से एफएफसी, जो फौजी फाउंडेशन के तहत संचालित होती है और जिसका संबंध पाकिस्तान सेना से है, की भागीदारी ने व्यापक राजनीतिक और आर्थिक बहस को जन्म दिया है।
फौजी फाउंडेशन की प्रशासनिक समिति का नेतृत्व पाकिस्तान के रक्षा सचिव करते हैं। इसमें सेना, नौसेना और वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल होते हैं। ऐसे में पीआईए के निजीकरण में सेना से जुड़ी कंपनी की बड़ी हिस्सेदारी ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में सेना के बढ़ते प्रभाव को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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विश्लेषकों का मानना है कि हाल के वर्षों में सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के नेतृत्व में पाकिस्तान की सेना का कॉरपोरेट और आर्थिक मामलों में दखल बढ़ा है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी पीआईए के निजीकरण में स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल (एसआईएफसी) और आसिम मुनीर की भूमिका की सराहना की, जिससे इस मुद्दे पर नई बहस छिड़ गई है।
दरअसल, पीआईए कई वर्षों से भारी घाटे, खराब प्रबंधन, पुराने विमानों और रखरखाव संबंधी समस्याओं से जूझ रही थी। वर्ष 2020 में कराची में पीआईए विमान दुर्घटना में 97 लोगों की मौत के बाद जांच में बड़ी संख्या में फर्जी या संदिग्ध लाइसेंस वाले पायलटों का मामला सामने आया। इससे एयरलाइन की साख को गहरा झटका लगा और अंततः इसके निजीकरण का रास्ता साफ हुआ।
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