भारत में बिकने वाले पैकेज्ड खाद्य और पेय पदार्थ एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन में बिकने वाली फैंटा में भारत में उपलब्ध इसी पेय की तुलना में काफी कम चीनी होती है। इस अंतर ने भारत में खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता, कीमत और लेबलिंग नियमों को लेकर बहस तेज कर दी है।
खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञ उर्वशी अग्रवाल के अनुसार, भारत और ब्रिटेन में फैंटा जैसे शीतल पेय की संरचना अलग होने का एक बड़ा कारण दोनों देशों का नियामकीय माहौल है। ब्रिटेन में शुगर टैक्स यानी कोल्ड ड्रिंक टैक्स लागू है। इसके तहत पेय में चीनी की मात्रा जितनी अधिक होती है, निर्माता को उतना ही अधिक कर देना पड़ता है। ऐसे में कंपनियों के पास कम चीनी वाले उत्पाद बनाने का आर्थिक प्रोत्साहन रहता है।
रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन में फैंटा के एक कैन में करीब 63 कैलोरी होती हैं, जबकि भारत में बिकने वाले संस्करण में लगभग तीन गुना अधिक चीनी होने की बात कही गई है। ब्रिटेन और यूरोप में कृत्रिम रंगों के इस्तेमाल को लेकर भी अपेक्षाकृत सख्त चेतावनियां लागू हैं।
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यह अंतर केवल शीतल पेय तक सीमित नहीं है। मैगी जैसे उत्पादों के कुछ ब्रिटिश संस्करणों में सूरजमुखी तेल का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि भारत में इसके सभी संस्करणों में पाम ऑयल इस्तेमाल होने की जानकारी दी गई है। भारत में पैकेट के सामने अधिक नमक, चीनी और वसा की स्पष्ट चेतावनी को लेकर भी लंबे समय से बहस जारी है।
विशेषज्ञ ने affordability यानी किफायती कीमत का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि बेहतर सामग्री और साफ लेबल वाले उत्पाद बाजार में आ रहे हैं, लेकिन बड़ी आबादी अभी भी उन्हें खरीदने में सक्षम नहीं है।
भारत में पैकेज्ड खाद्य एवं पेय बाजार 100 अरब डॉलर से अधिक का है। उद्योग के अनुमान के मुताबिक, इसके करीब 80 प्रतिशत उत्पादों में वसा, चीनी या नमक की मात्रा अधिक हो सकती है। हालांकि, भारतीय नियमों के तहत फिलहाल पैकेजिंग के पीछे पोषण संबंधी जानकारी देना मुख्य आवश्यकता है।
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