करीब 108 साल पहले 1918-19 में फैली इन्फ्लूएंजा महामारी ने दिल्ली में भारी तबाही मचाई थी। ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक, अकेले दिल्ली शहर में 7,044 लोगों की मौत हुई, जबकि पूरे दिल्ली प्रांत में मृतकों की संख्या 23,175 तक पहुंच गई थी। इस भयावह स्थिति के बाद ब्रिटिश भारत प्रशासन ने सितंबर 1920 में साधारण इन्फ्लूएंजा को आधिकारिक रूप से संक्रामक और रिपोर्ट किए जाने वाले रोगों की सूची में शामिल किया।
दिल्ली अभिलेखागार में मौजूद दस्तावेजों के अनुसार, शुरुआती मामलों में एक बीमार यूरोपीय व्यक्ति शामिल था, जो शिमला से दिल्ली आया था। उसके परिवार के कई सदस्य पहले से बीमारी की चपेट में थे। शुरुआत में बीमारी को लेकर ज्यादा चिंता नहीं थी, लेकिन अक्टूबर 1918 तक संक्रमण तेजी से फैलने लगा।
दिल्ली के सिविल अस्पताल में पहले रोजाना केवल एक-दो मरीज पहुंच रहे थे, लेकिन अक्टूबर के तीसरे सप्ताह तक प्रतिदिन 100 से ज्यादा मामले सामने आने लगे। 14 अक्टूबर को अकेले 181 मामले दर्ज किए गए। गंभीर मरीजों में निमोनिया, ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों से जुड़ी अन्य जटिलताएं देखने को मिलीं। डॉक्टरों पर भी मरीजों की भारी संख्या का दबाव बढ़ गया था।
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अक्टूबर और नवंबर के दौरान पूरे दिल्ली प्रांत में 23,175 मौतें दर्ज हुईं। इनमें 7,044 मौतें दिल्ली शहर और 16,131 मौतें ग्रामीण क्षेत्रों में हुईं। ऐतिहासिक शोध में भारत में इस महामारी से मौतों का अनुमान 1.2 करोड़ या उससे अधिक तक लगाया गया है, हालांकि उस समय कमजोर मृत्यु-पंजीकरण व्यवस्था के कारण सटीक आंकड़ा तय करना कठिन है।
विशेषज्ञों के अनुसार, 1918 में बीमारी की पहली लहर अपेक्षाकृत हल्की थी, जबकि सितंबर में आई दूसरी लहर कहीं ज्यादा घातक साबित हुई। रेलवे नेटवर्क के कारण संक्रमण देश के कई हिस्सों में तेजी से फैला। युवा वयस्कों पर भी इसका गंभीर असर देखा गया।
महामारी के बाद दिल्ली प्रशासन ने इन्फ्लूएंजा और उससे जुड़ी जटिलताओं की अनिवार्य रिपोर्टिंग पर विचार किया। बॉम्बे, मद्रास और इंग्लैंड की व्यवस्थाओं का अध्ययन करने के बाद सितंबर 1920 में दिल्ली में साधारण इन्फ्लूएंजा को आधिकारिक रूप से संक्रामक रोग घोषित किया गया।
आज इन्फ्लूएंजा की निगरानी कहीं अधिक व्यवस्थित है। एच1एन1 जैसे रिपोर्टेबल संक्रमणों की जानकारी सार्वजनिक स्वास्थ्य और अस्पताल निगरानी व्यवस्था के माध्यम से दी जाती है। हालांकि, हर मौसमी फ्लू मरीज की अलग-अलग जांच या रिपोर्ट अनिवार्य नहीं होती।
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