तेजी से बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय रणनीतिक हालात के बीच भारत का ताज़ा रक्षा बजट किसी बड़े बदलाव से अधिक निरंतरता का संकेत देता है। रक्षा मंत्रालय के लिए ₹7.85 लाख करोड़ का आवंटन — जो पिछले वर्ष ₹6.81 लाख करोड़ था — यह स्पष्ट करता है कि भारत की वित्तीय प्राथमिकताओं में सुरक्षा केंद्रीय स्थान पर बनी हुई है। इस राशि में से ₹2.19 लाख करोड़ पूंजीगत व्यय के लिए निर्धारित किए गए हैं, जिनका उद्देश्य सशस्त्र बलों का आधुनिकीकरण है। इसमें ₹63,733 करोड़ विमान और एयरो-इंजन के लिए तथा ₹25,023 करोड़ नौसेना के लिए रखे गए हैं। शेष ₹5.54 लाख करोड़ राजस्व व्यय के अंतर्गत आते हैं, जिनमें अकेले पेंशन का हिस्सा ₹1.71 लाख करोड़ है।
इन आवंटनों के साथ सरकार ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के अपने लक्ष्य को आगे बढ़ाने की भी कोशिश की है। नागरिक, प्रशिक्षण और अन्य विमानों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले पुर्ज़ों पर मूल सीमा शुल्क से छूट तथा विमान रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉल में उपयोग होने वाले कच्चे माल पर शुल्क माफी, इस दिशा में अहम कदम हैं। इसका उद्देश्य घरेलू एयरोस्पेस विनिर्माण को मज़बूत करना और आयात पर निर्भरता कम करना है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत का रक्षा बजट लगातार बढ़ा है, जो जटिल होते सुरक्षा माहौल — खासकर उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर तनाव तथा इंडो-पैसिफिक में महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा — को दर्शाता है। पुराने सैन्य उपकरणों का आधुनिकीकरण अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है। हालांकि, महंगाई और अत्याधुनिक सैन्य तकनीकों की बढ़ती लागत को देखते हुए वास्तविक क्षमता वृद्धि अक्सर अपेक्षाओं से कम रहती है। चुनौती केवल अधिक खर्च करने की नहीं, बल्कि प्रभावी ढंग से खर्च करने की है।
और पढ़ें: राजस्थान में 9,550 किलो विस्फोटक बरामद, एक आरोपी गिरफ्तार; केंद्रीय एजेंसियां जांच में हो सकती हैं शामिल
एक सकारात्मक रुझान यह है कि कुल रक्षा बजट में पूंजीगत व्यय का हिस्सा धीरे-धीरे बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2020 से 2025 के बीच इसमें औसतन 9.1% की वार्षिक वृद्धि हुई है और पिछले एक दशक में यह लगभग दोगुना हो चुका है। यह बदलाव भविष्य की सैन्य क्षमताओं को आकार देने वाली तकनीकों और प्लेटफॉर्म में निवेश की दिशा में संकेत करता है।
हालांकि, कुल बजट में पूंजीगत व्यय का अनुपात अब भी सीमित है। राजस्व व्यय का भारी बोझ, विकासात्मक प्राथमिकताएं और वित्तीय सीमाएं आधुनिकीकरण की रफ्तार को धीमा करती हैं। तकनीकी बढ़त आज युद्ध में निर्णायक होती जा रही है, लेकिन चीन जैसे क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धियों की तुलना में भारत की स्थिति अब भी चुनौतीपूर्ण है। साइबर, अंतरिक्ष और ड्रोन जैसी उभरती क्षमताओं में निवेश बढ़ाने के लिए निरंतर अनुसंधान एवं विकास आवश्यक होगा।
आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत 70% से अधिक पूंजीगत खरीद स्वदेशी स्रोतों से करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके परिणामस्वरूप रक्षा उत्पादन और निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। फिर भी, अत्याधुनिक तकनीकों के लिए विदेशी निर्भरता बनी हुई है। कुल मिलाकर, भारत का रक्षा बजट एक परिचित विरोधाभास को दर्शाता है—ऊँची रणनीतिक महत्वाकांक्षा, लेकिन सीमित वित्तीय और संरचनात्मक क्षमता।
और पढ़ें: राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ का आरोप, बंगाल में महा जंगल राज खत्म करने का आह्वान: पीएम मोदी