अर्मेनिया में रविवार (7 जून 2026) को संसदीय चुनावों के लिए मतदान हो रहा है। यह चुनाव ऐसे समय में हो रहा है जब देश की मौजूदा सरकार पर रूस (मॉस्को) की ओर से बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच अपनी विदेश नीति को नए दिशा में ले जाने की कोशिश कर रही है। सरकार का लक्ष्य पश्चिमी देशों के साथ सहयोग बढ़ाना और रूस पर निर्भरता को कम करना है।
प्रधानमंत्री निकोल पशिन्यान और उनकी सत्तारूढ़ पार्टी सिविल कॉन्ट्रैक्ट इस चुनाव में एक मजबूत जनादेश हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि देश की भू-राजनीतिक दिशा को बदलने की उनकी नीति को समर्थन मिल सके।
चुनाव में विपक्षी दलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। कई विपक्षी दल खुले तौर पर रूस समर्थक माने जाते हैं और वे सरकार की पश्चिम की ओर झुकाव वाली नीति का विरोध कर रहे हैं। इससे चुनावी मुकाबला और अधिक जटिल हो गया है।
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विशेषज्ञों के अनुसार, यह चुनाव केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अर्मेनिया की विदेश नीति की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण मोड़ भी माना जा रहा है। रूस लंबे समय से इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश करता रहा है, जबकि मौजूदा सरकार यूरोपीय संघ और पश्चिमी देशों के साथ संबंध मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
देश में मतदान शांतिपूर्ण माहौल में जारी है, और प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। नागरिक बड़ी संख्या में मतदान केंद्रों पर पहुंचकर अपने मताधिकार का उपयोग कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन चुनावों के नतीजे आने वाले वर्षों में अर्मेनिया की विदेश नीति, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।
इस चुनाव को रूस और पश्चिम के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के एक अहम संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।
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