बेंगलुरु स्थित 'इंटरनेशनल सेंटर फॉर थियोरेटिकल साइंसेज' (ICTS) ने 25 अक्टूबर को जानकारी दी कि संस्थान के प्रोफेसर अशोक सेन को प्रतिष्ठित 'ऑस्कर क्लेन मेडल' से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान पाने वाले अशोक सेन पहले भारतीय वैज्ञानिक बन गए हैं।
सैद्धांतिक भौतिकी (थियोरेटिकल फिजिक्स) के सर्वोच्च सम्मानों में गिना जाने वाला यह पदक स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी और 'रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज' की 'नोबेल कमिटी फॉर फिजिक्स' द्वारा वर्ष 1988 से हर साल दिया जाता है। इसका नाम स्वीडिश सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी ऑस्कर क्लेन के नाम पर रखा गया है और यह भौतिकी के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रदान किया जाता है।
अशोक सेन 'स्ट्रिंग थ्योरी' पर अपने काम के लिए विश्वभर में जाने जाते हैं। स्ट्रिंग थ्योरी, क्वांटम थ्योरी और गुरुत्वाकर्षण के बीच की विसंगतियों को दूर करने के प्रमुख प्रयासों में से एक है, जिसका उद्देश्य भौतिकी की एक ऐसी नई 'ग्रैंड यूनिफाइड थ्योरी' खोजना है जो उप-परमाणु कणों से लेकर विशाल आकाशगंगाओं तक, हर स्तर पर सभी कणों और बलों के व्यवहार की व्याख्या कर सके।
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इससे पहले अशोक सेन को 'डिराक मेडल' और 'ब्रेकथ्रू प्राइज इन फंडामेंटल फिजिक्स' जैसे अत्यंत प्रतिष्ठित सम्मान भी मिल चुके हैं। उन्हें आईसीटीपी पुरस्कार, 2009 में इन्फोसिस पुरस्कार (गणितीय विज्ञान) और शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार से भी नवाज़ा जा चुका है। साल 2001 में उन्हें भारत सरकार की ओर से पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।
अशोक सेन ने वर्ष 1978 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर से भौतिकी में मास्टर डिग्री पूरी की। इसके बाद उन्होंने अमेरिका की स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क, स्टोनी ब्रुक (SUNY Stony Brook) से भौतिकी में पीएचडी की। उन्होंने फर्मी नेशनल एक्सेलरेटर लैबोरेटरी में पोस्टडॉक्टोरल शोध किया और इसके बाद स्टैनफोर्ड लीनियर एक्सेलरेटर सेंटर (SLAC), अमेरिका में भी शोध कार्य किया।
'ऑस्कर क्लेन मेडल' पाने वालों की सूची में स्टीफन हॉकिंग, पीटर हिग्स, चेन-निंग यांग, स्टीवन वेनबर्ग और हंस बेथे जैसे नोबेल पुरस्कार विजेता शामिल हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय वैज्ञानिकों को मिले शीर्ष भौतिकी सम्मानों की श्रृंखला में यह पदक सबसे नया है।
बता दें कि प्रोफेसर अशोक सेन की पत्नी प्रोफेसर सुमति राव भी हरिश्चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट में वैज्ञानिक रह चुकी हैं। अशोक सेन की यह उपलब्धि भारत में सैद्धांतिक भौतिकी के क्षेत्र में हो रहे शोध कार्यों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान दिलाने वाली मानी जा रही है।
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