असम क्रिश्चियन फोरम ने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन विधेयक का कड़ा विरोध किया है। फोरम ने केंद्र सरकार और पूर्वोत्तर के आठ राज्यों से आने वाले सांसदों से अपील की है कि वे विधेयक में शामिल कथित कठोर प्रावधानों को आगे बढ़ाने से बचें।
फोरम का कहना है कि प्रस्तावित बदलावों का सबसे अधिक असर उन लोगों पर पड़ेगा, जिन्हें दूरदराज और आदिवासी इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य जरूरी सेवाओं के लिए सहायता मिलती है। संगठन ने केंद्र से मौजूदा विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम, 2010 में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप संशोधन करने का आग्रह किया है।
फोरम के अनुसार, असम समेत पूर्वोत्तर भारत के कई दुर्गम आदिवासी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, औषधालय और अन्य सामाजिक संस्थान विदेशी अंशदान की मदद से आंशिक या पूरी तरह स्थापित किए गए हैं। इसका प्रमुख कारण इन क्षेत्रों में सरकारी बुनियादी ढांचे की कमी रही है।
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संगठन ने आशंका जताई कि यदि प्रस्तावित संशोधन के कथित कठोर प्रावधान लागू किए जाते हैं, तो इन संस्थानों के संचालन और उनके माध्यम से लाभ पाने वाले लोगों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। विशेष रूप से उन समुदायों के लिए परेशानी बढ़ सकती है, जो शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं के लिए इन संस्थानों पर निर्भर हैं।
असम क्रिश्चियन फोरम ने कहा कि विदेशी अंशदान से संचालित संस्थाओं के कामकाज को नियंत्रित करने के लिए पारदर्शी और न्यायसंगत व्यवस्था जरूरी है, लेकिन कानून में ऐसे प्रावधान नहीं होने चाहिए जिनसे वास्तविक लाभार्थियों को नुकसान पहुंचे।
फोरम ने केंद्र सरकार से प्रस्तावित विधेयक पर पुनर्विचार करने और सभी संबंधित पक्षों के साथ व्यापक चर्चा करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि पूर्वोत्तर के सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कानून में बदलाव किए जाने चाहिए।
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