पंजाब में किसानों का कर्ज एक बार फिर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है। भगवंत मान सरकार ने प्रस्तावित वन-टाइम सेटलमेंट (ओटीएस) नीति की घोषणा की है। खास तौर पर सहकारी बैंकों और समितियों से लिए गए कृषि ऋणों को लेकर यह घोषणा महत्वपूर्ण मानी जा रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव में एक साल से भी कम समय बचा है, ऐसे में किसान कर्ज का मुद्दा पंजाब की ग्रामीण राजनीति के केंद्र में लौट आया है।
आम आदमी पार्टी सरकार की यह पहल 2017 के विधानसभा चुनाव की याद भी दिलाती है, जब कांग्रेस नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने किसानों की कर्जमाफी को अपने प्रमुख चुनावी वादों में शामिल किया था। यह वादा तत्कालीन शिरोमणि अकाली दल-भाजपा सरकार के खिलाफ कांग्रेस के बड़े राजनीतिक हथियारों में से एक बना और ग्रामीण मतदाताओं को पार्टी के पक्ष में लामबंद करने में मदद मिली।
हालांकि, मान सरकार की प्रस्तावित योजना पूर्ण कर्जमाफी नहीं है। सरकार की योजना के अनुसार, राजनीतिक दलों की भागीदारी वाली एक समिति ओटीएस नीति तैयार करेगी और बकाया कर्ज के निपटारे का तरीका तय करेगी। किसानों को मिलने वाली राहत, पात्रता और सरकार पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ का वास्तविक स्वरूप नीति के विवरण पर निर्भर करेगा।
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अमरिंदर सिंह सरकार ने चरणबद्ध तरीके से पांच एकड़ तक जमीन वाले छोटे और सीमांत किसानों के दो लाख रुपये तक के फसल ऋण माफ किए थे। बाद में भूमिहीन मजदूरों को भी राहत के दायरे में लाया गया। हालांकि, आलोचकों ने कहा था कि यह योजना चुनावी वादे के मुताबिक पूर्ण और बिना शर्त कर्जमाफी नहीं थी।
मान सरकार की घोषणा किसान संगठनों के चंडीगढ़-मोहाली सीमा पर आंदोलन वापस लेने के बाद हुई। सरकार ने पंजाब के जल अधिकार, पुनर्गठन अधिनियम, बांध सुरक्षा अधिनियम और बीज विधेयक 2025 पर एक महीने के भीतर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने का आश्वासन भी दिया है।
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