मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने पारिवारिक रिश्तों और बुजुर्गों की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इंदौर में बच्चों द्वारा बेसहारा छोड़े गए घनश्याम राजपूत पिछले करीब तीन वर्षों से आनंद धाम वृद्धाश्रम में रह रहे थे। 4 अगस्त को उनकी मौत हो गई, लेकिन अंतिम विदाई देने के लिए उनका कोई बच्चा नहीं पहुंचा।
घनश्याम ने जीवनभर पंचर और टायर-ट्यूब का काम कर अपने चार बच्चों का पालन-पोषण किया। उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई बच्चों की परवरिश और भविष्य पर खर्च की। बताया गया कि करीब एक साल पहले बच्चे उन्हें इंदौर के बस स्टैंड पर छोड़ गए थे। बाद में सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से उन्हें आनंद धाम वृद्धाश्रम पहुंचाया गया।
वृद्धाश्रम में रहते हुए घनश्याम लगातार अपने बच्चों का इंतजार करते रहे। अन्य बुजुर्गों के अनुसार, वह अक्सर अपने परिवार को याद करते थे, लेकिन उनसे मिलने कोई नहीं आया। 4 अगस्त को उनकी मृत्यु के बाद परिवार से संपर्क किया गया, लेकिन अंतिम संस्कार में भी कोई शामिल नहीं हुआ।
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बच्चों की ओर से कथित तौर पर संपत्ति को लेकर सवाल उठाया गया। उन्होंने कहा कि पिता ने संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया, इसलिए उनके अंतिम संस्कार में आने का क्या मतलब है। इस जवाब ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया।
आनंद धाम वृद्धाश्रम की संचालिका माधुरी मिश्रा ने बताया कि अक्सर बुजुर्गों की मृत्यु के बाद संपत्ति या जमीन-जायदाद से जुड़े दस्तावेजों के लिए परिजन संपर्क करते हैं।
यह घटना सवाल छोड़ती है कि क्या माता-पिता के त्याग और प्यार का मूल्य अब संपत्ति से तय होने लगा है। जिस पिता ने बच्चों का भविष्य संवारने में पूरी जिंदगी लगा दी, उन्हें अंतिम समय में अपनों का साथ तक नहीं मिला।
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