यह कहानी है वर्ष 2002 की, जब बिहार के सारण जिले में होली के अगले दिन जेल के भीतर हालात पूरी तरह बेकाबू हो गए थे। उस समय सारण जिले के पुलिस अधीक्षक (एसपी) कुंदन कृष्णन, उनके बॉडीगार्ड जितेंद्र सिंह और तत्कालीन थाना प्रभारी (SHO) अर्जुन लाल ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने न केवल पुलिस के तयशुदा प्रोटोकॉल को चुनौती दी, बल्कि उन्हें राज्य की बहादुरी की गाथाओं में अमर कर दिया।
होली के बाद की सुबह के शुरुआती घंटे थे। जब पूरा राज्य धीरे-धीरे नींद से जाग रहा था, तभी छपरा जेल परिसर के भीतर हालात विस्फोटक बन चुके थे। करीब 1,200 कैदियों ने जेल प्रशासन को बाहर खदेड़ते हुए जेल पर कब्जा कर लिया था। जेल के अंदर हिंसक दंगे हो रहे थे और हालात इतने खतरनाक हो चुके थे कि किसी भी तरह का हस्तक्षेप जानलेवा साबित हो सकता था।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए एसपी कुंदन कृष्णन ने मानक पुलिस प्रक्रिया को दरकिनार करने का साहसिक निर्णय लिया। वे अपने बॉडीगार्ड जितेंद्र सिंह और एसएचओ अर्जुन लाल के साथ छपरा जेल की ऊंची दीवारें फांदकर अंदर दाखिल हुए। तीनों प्रशासनिक भवन की छत पर उतरे और वहां से सीधे उस जगह पहुंचे, जहां कैदी उग्र रूप में मौजूद थे।
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जेल के भीतर कैदियों ने मुख्य लोहे के गेट के सामने गैस सिलेंडरों का ढेर लगा दिया था, ताकि किसी भी बाहरी कार्रवाई को रोका जा सके और जरूरत पड़ने पर आगजनी की जा सके। यह स्थिति किसी भी पल बड़े विस्फोट में बदल सकती थी।
अत्यंत जोखिम के बावजूद इन तीनों पुलिसकर्मियों ने साहस, सूझबूझ और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हुए हालात को काबू में करने में अहम भूमिका निभाई। इसी असाधारण वीरता और निडरता के लिए कुंदन कृष्णन, जितेंद्र सिंह और अर्जुन लाल को बाद में गैलेंट्री मेडल से सम्मानित किया गया।
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