कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका शुक्रवार को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के सामने पेश हुए। दोनों नेताओं को 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों में पूछताछ के लिए बुलाया गया था। पुलिस के अनुसार, उन पर कथित तौर पर अनधिकृत रूप से प्रवेश करने और सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा डालने के आरोप हैं।
इस मामले में दोनों नेताओं को बुधवार को लिखित आश्वासन देने के बाद रिहा कर दिया गया था। उन्होंने वादा किया था कि वे शांति भंग नहीं करेंगे। इससे पहले क्राइम ब्रांच ने पूछताछ के लिए उन्हें समन जारी किया था, लेकिन दोनों ने पेश होने के लिए अतिरिक्त समय मांगा था। बाद में दोनों मामलों को क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया।
50-50 हजार रुपये के मुचलके का आदेश
दोनों नेताओं को जांच पूरी होने तक 50-50 हजार रुपये के निजी मुचलके और जमानती बांड भरने का निर्देश दिया गया था। जंतर-मंतर पर सीजेपी के विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में हिरासत में लिए जाने के बाद 14 अक्टूबर को उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। 19 अक्टूबर को उनकी हिरासत दो दिन के लिए बढ़ाई गई थी, जिसकी अवधि बुधवार को समाप्त हो गई।
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अदालत ने किन शर्तों पर रिहा किया?
विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत ने बुधवार को दोनों नेताओं की रिहाई का आदेश दिया। अदालत के अनुसार, उन्होंने लिखित आश्वासन दिया कि वे शांति भंग नहीं करेंगे और जब तक जंतर-मंतर प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित नहीं होता, वहां विरोध प्रदर्शन का आह्वान नहीं करेंगे।
पुलिस ने उनकी हिरासत तीन दिन और बढ़ाने की मांग की थी। पुलिस का तर्क था कि उनके पिछले व्यवहार और मीडिया में दिए गए बयानों के कारण कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका बनी हुई है। आदेश के अनुसार, पुलिस ने अदालत और मीडिया में दिए गए कथनों में कथित विरोधाभास का भी उल्लेख किया था।
सीजेपी और अन्य नेताओं ने किया स्वागत
सीजेपी ने दोनों नेताओं की रिहाई का स्वागत किया। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने उन्हें अपने से भी बड़ा नेता बताया, जबकि पार्टी की कानूनी प्रमुख रत्ना सिंह ने कहा कि फैसला पहले आना चाहिए था।
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी रिहाई का स्वागत किया और कहा कि पूरा देश उनके साथ है। वहीं, भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने पहले कहा था कि उनकी न्यायिक हिरासत शांति बांड के उल्लंघन से जुड़ी थी, न कि राष्ट्रीय ध्वज फहराने की कोशिश से।
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