असम की प्रतिष्ठित कॉटन यूनिवर्सिटी (सीयू) और पर्यावरण संरक्षण संस्था आरण्यक ने सोमवार को एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते का उद्देश्य जैव विविधता संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय शासन, आपदा जोखिम न्यूनीकरण और सतत विकास जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शैक्षणिक और शोध सहयोग को बढ़ावा देना है।
इस समझौते के तहत दोनों संस्थान मिलकर विभिन्न शोध परियोजनाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों, कार्यशालाओं और ज्ञान साझा करने वाली गतिविधियों को आगे बढ़ाएंगे। इसका लक्ष्य पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर वैज्ञानिक अध्ययन को प्रोत्साहित करना और छात्रों तथा शोधकर्ताओं को बेहतर अवसर उपलब्ध कराना है।
कॉटन यूनिवर्सिटी और आरण्यक के बीच यह साझेदारी पूर्वोत्तर भारत के पर्यावरणीय महत्व को देखते हुए काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पूर्वोत्तर क्षेत्र जैव विविधता के लिहाज से दुनिया के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में शामिल है, लेकिन जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं और मानवीय गतिविधियों के कारण यहां के पारिस्थितिकी तंत्र पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।
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एमओयू के माध्यम से दोनों संस्थान पर्यावरण संरक्षण से जुड़े व्यावहारिक समाधान विकसित करने, स्थानीय समुदायों के साथ काम करने और प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन को बढ़ावा देने की दिशा में प्रयास करेंगे।
इस सहयोग में छात्रों और युवा शोधकर्ताओं को विशेष लाभ मिलने की उम्मीद है। उन्हें पर्यावरण विज्ञान, वन्यजीव संरक्षण, जलवायु अध्ययन और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक अनुभव और शोध के नए अवसर मिल सकेंगे।
आरण्यक लंबे समय से पूर्वोत्तर भारत में जैव विविधता संरक्षण, वन्यजीव सुरक्षा और पर्यावरण जागरूकता के क्षेत्र में काम कर रहा है। वहीं, कॉटन यूनिवर्सिटी शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में एक प्रमुख संस्थान है।
दोनों संस्थानों ने कहा कि यह साझेदारी वैज्ञानिक ज्ञान और जमीनी अनुभव को जोड़ने का काम करेगी। इससे पर्यावरणीय चुनौतियों को समझने और उनके समाधान विकसित करने में मदद मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे शैक्षणिक और शोध सहयोग वर्तमान समय में बेहद जरूरी हैं, क्योंकि जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए विज्ञान आधारित रणनीतियों की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। यह समझौता सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
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