दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी व्यक्ति या कंपनी पर कोई आरोप या संदेह नहीं है, तो उनके बैंक खातों को बिना कारण बड़े पैमाने पर फ्रीज करना मनमाना और संविधान के खिलाफ है। अदालत ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई लोगों के आजीविका के अधिकार और व्यापार करने की स्वतंत्रता का उल्लंघन करती है।
जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने कहा कि बिना सोच-समझकर खातों को फ्रीज करने से किसी निर्दोष संस्था के रोजमर्रा के कारोबार पर गंभीर असर पड़ता है। इससे कंपनी की व्यावसायिक साख को नुकसान पहुंचता है और आर्थिक संकट पैदा होता है।
यह टिप्पणी मलाबार गोल्ड एंड डायमंड्स की याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई। कंपनी ने केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाले इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) से अपने बैंक खातों पर लगी रोक हटाने की मांग की थी। I4C देश में साइबर अपराध से निपटने के लिए नोडल एजेंसी के रूप में काम करता है।
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मामले में बताया गया कि कंपनी के एक ग्राहक पर साइबर धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज हुई थी, जिसके बाद पुलिस के निर्देश पर मार्च 2025 तक कंपनी के लगभग 80 लाख रुपये बैंक खातों में रोक दिए गए थे। हालांकि जांच में कंपनी के खिलाफ कोई शिकायत या संलिप्तता सामने नहीं आई।
अदालत ने 16 जनवरी को दिए फैसले में I4C को निर्देश दिया कि वह तुरंत SBI और HDFC बैंक को खातों से रोक हटाने का आदेश दे। अदालत ने कहा कि बिना किसी सबूत के खातों को लंबे समय तक फ्रीज रखना गलत है और इससे कर्मचारियों को वेतन देने और रोजमर्रा के खर्च पूरे करने में दिक्कत होती है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि जांच एजेंसी के पास कोई सबूत है, तो वह कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकती है, लेकिन बिना कारण खातों को फ्रीज करना उचित नहीं है।
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