दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसे तीन बार खारिज किया गया था और जो 20 वर्षों से अधिक समय से लंबित थी। यह याचिका केंद्र सरकार ने उस मामले में की थी, जिसे पहले गैर-प्रारंभिकता के कारण खारिज किया गया था।
यह कानूनी विवाद 2005 में एक औद्योगिक न्यायाधिकरण द्वारा पारित एक आदेश से उत्पन्न हुआ था, जिसमें एक श्रमिक को उसकी पूरी बकाया वेतन के साथ बहाल करने का आदेश दिया गया था। इस मामले में, केंद्र सरकार ने याचिका दायर की थी, जिसमें 20 वर्षों के बाद याचिका को फिर से बहाल करने की मांग की गई थी।
दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति रेणु भटनागर ने कहा कि सरकारी विभागों को किसी भी मामले में विशेष उपचार नहीं मिल सकता। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि सरकार के विभागों को भी सामान्य नागरिकों की तरह कानूनी मामलों में सावधानी से कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि विभागों के पास मुकदमे की सीमा में छूट नहीं हो सकती और उन्हें अपनी ओर से कड़ी मेहनत और त्वरित कार्यवाही करनी चाहिए।
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कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार के विभागों को अपने कानूनी मामलों में पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए, और किसी भी परिस्थिति में उन्हें किसी विशेष सुविधा की उम्मीद नहीं होनी चाहिए। अदालत ने इस फैसले से यह संदेश दिया कि सरकारी विभागों को भी नागरिकों के समान जिम्मेदारी के साथ कानून के तहत कार्य करना चाहिए।
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