दिल्ली दंगों से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (5 जनवरी 2026) को स्पष्ट किया कि मुकदमे में देरी को जमानत हासिल करने के लिए “ट्रम्प कार्ड” की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने पूर्व जेएनयू छात्र नेता उमर खालिद और शरजील इमाम को बिना ट्रायल के करीब छह साल जेल में बिताने के बावजूद जमानत देने से इनकार कर दिया।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने फैसले में कहा कि संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन का अधिकार न तो “पूर्ण” है और न ही “अनियंत्रित”। अदालत ने रेखांकित किया कि ये अधिकार भी कुछ परिस्थितियों में प्रतिबंधों के अधीन होते हैं, खासकर जब मामला गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए जैसे विशेष कानूनों के तहत दर्ज हो।
पीठ ने कहा कि यदि राज्य के पास ऐसे प्रथम दृष्टया ठोस सबूत मौजूद हैं, जो यह दर्शाते हों कि आरोपियों की भूमिका किसी आतंकी गतिविधि को अंजाम देने में जानबूझकर, केंद्रीय और निर्णायक रही है, तो केवल लंबी अवधि तक विचाराधीन कैद या ट्रायल में देरी के आधार पर स्वतः जमानत नहीं दी जा सकती।
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सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यूएपीए जैसे कानूनों का उद्देश्य देश की सुरक्षा, संप्रभुता और सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा करना है। ऐसे मामलों में अदालत को आरोपों की गंभीरता, उपलब्ध सामग्री और संभावित प्रभावों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना होता है।
अदालत ने कहा कि संवैधानिक अधिकारों और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। इसलिए, हर मामले में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को पूर्ण रूप से लागू नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब राज्य यह दिखाने में सफल हो जाए कि आरोपी की कथित भूमिका गंभीर और संगठित साजिश का हिस्सा रही है।
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