पेरिस से मिली जानकारी के अनुसार, फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने बताया कि हाल के सप्ताहांत में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद लागू किए गए लक्षित कर्फ्यू का असर देखने को मिला है और प्रभावित शहरों में रात के समय हालात शांतिपूर्ण रहे। उन्होंने संकेत दिया कि यदि अशांति जारी रहती है तो आने वाले दिनों में और अधिक शहरों में या अधिक सख्ती के साथ कर्फ्यू लगाए जा सकते हैं।
सप्ताहांत के दौरान फ्रांस के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शनों के चलते तनाव की स्थिति बनी थी, जिसके बाद प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए चुनिंदा क्षेत्रों में रात्रि कर्फ्यू लागू करने का फैसला लिया था। प्रधानमंत्री लेकोर्नू के अनुसार, यह कदम कारगर साबित हुआ है और सुरक्षा बलों की तैनाती से शहरों में रात के समय अपेक्षाकृत शांति बनी रही। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासन स्थिति पर लगातार निगरानी रख रहा है और आगे की रणनीति हालात के आधार पर तय की जाएगी।
इसी बीच, यूरोप में एक अन्य महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की के साथ बातचीत के लिए पहुंचे। इस उच्चस्तरीय वार्ता में नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गार स्टोरे और फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब भी शामिल हुए। यह बैठक यूक्रेन से जुड़े मौजूदा हालात और क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति पर चर्चा के लिए आयोजित की गई बताई जा रही है।
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ओस्लो में हो रही इस बैठक को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसमें अमेरिका, यूक्रेन, नॉर्वे और फिनलैंड के शीर्ष नेता एक साथ मौजूद हैं। स्टीव विटकॉफ की यह यात्रा ऐसे समय हुई है जब यूरोप में कई मोर्चों पर राजनीतिक और सामाजिक हलचल देखी जा रही है, जिसमें फ्रांस की स्थिति भी शामिल है।
फ्रांसीसी प्रशासन और प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि आने वाले दिनों में सुरक्षा स्थिति की समीक्षा के बाद कर्फ्यू संबंधी नीतियों में बदलाव किया जा सकता है। स्थानीय प्रशासन सप्ताहांत की घटनाओं के पीछे के कारणों की भी जांच कर रहा है ताकि भविष्य में इस तरह की अशांति को रोकने के लिए उचित कदम उठाए जा सकें।
फिलहाल फ्रांस के प्रभावित शहरों में स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है, लेकिन प्रशासन सतर्क रुख अपनाए हुए है। वहीं ओस्लो में जारी वार्ता पर भी यूरोप सहित पूरी दुनिया की नज़र बनी हुई है, क्योंकि इसके नतीजे यूक्रेन से जुड़ी आगे की कूटनीतिक रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
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