लोकसभा में गुरुवार (4 दिसंबर 2025) को केंद्र सरकार ने आदिवासी क्षेत्रों में पिछले पाँच वर्षों के दौरान कुपोषण के कारण हुए शिशु मौतों की संख्या पर पूछे गए सीधे प्रश्न का उत्तर देने से परहेज़ किया। तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत रॉय ने सरकार से यह स्पष्ट जानकारी मांगी थी कि आदिवासी इलाकों में कुपोषण के चलते कितने बच्चों की जान गई है।
इसके जवाब में जनजातीय कार्य मंत्रालय ने चार प्रश्नों का विस्तृत उत्तर दिया, लेकिन इसमें मृतकों का कोई स्पष्ट आंकड़ा शामिल नहीं था। मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा कि सरकार विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से सभी बच्चों में कुपोषण की समस्या का समाधान करने के लिए काम कर रही है। मंत्रालय ने स्टंटिंग, वेस्टिंग और अंडरवेट बच्चों से संबंधित राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के पुराने सार्वजनिक डेटा को शामिल किया, और कुपोषण के कारण होने वाली मृत्यु और बीमारी को कम करने के लिए जारी प्रोटोकॉल का उल्लेख किया।
जनजातीय कार्य राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने जवाब में बताया कि जनसंख्या आकलन के अनुसार देश में पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की संख्या 13.7 करोड़ से अधिक है। लेकिन इनमें से केवल लगभग 6.6 करोड़ बच्चे ही आंगनवाड़ी केंद्रों में पंजीकृत हैं और सरकार के पोषण ट्रैकर में दर्ज किए गए हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि लगभग आधे से अधिक बच्चे पोषण निगरानी व्यवस्था से बाहर हैं।
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संसद में विपक्ष ने सरकार पर यह सवाल उठाया कि जब आधारभूत आंकड़े ही उपलब्ध नहीं हैं, तो आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण की वास्तविक स्थिति का आकलन कैसे किया जाएगा। सरकार के जवाब से असंतुष्ट विपक्ष ने कहा कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक है।
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