सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश विक्रम नाथ ने शनिवार को कहा कि न्यायपालिका में ईमानदारी कोई “विशेष गुण” नहीं है, बल्कि यह एक दिया हुआ मूलभूत अधिकार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका में ईमानदारी को किसी असाधारण गुण की तरह मनाना “समाज से अपेक्षित मानकों को कम कर सकता है।”
न्यायाधीश नाथ यह उद्गाटन भाषण देने के लिए गुजरात उच्च न्यायालय और गुजरात स्टेट ज्यूडिशियल अकादमी (GSJA) द्वारा आयोजित दो दिवसीय जिला न्यायालय न्यायाधीशों की वार्षिक सम्मेलन में मौजूद थे। उन्होंने कहा कि न्याय के पालन की शुरुआत उन वकीलों और अधिवक्ताओं के चरणों से होती है, जो आगे चलकर न्यायाधीश बनते हैं।
इस संदर्भ में उन्होंने ब्रिटिश न्यायाधीश एडवर्ड एबट पेरी द्वारा वर्णित “सात लालटेन” – ईमानदारी, साहस, उद्योग, बुद्धिमत्ता, वाकपटुता, न्याय और सहयोग – का हवाला दिया। न्यायाधीश नाथ ने बताया कि ये गुण न्यायपालिका में न्यायिक प्रक्रिया की नींव रखते हैं।
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न्यायाधीश नाथ ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की भूमिका पर भी प्रकाश डाला और कहा कि AI न्यायपालिका में सहायक हो सकता है, लेकिन इसके उपयोग की सीमा को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना आवश्यक है। उन्होंने चेताया कि अगर AI की सीमाओं का सही ढंग से निर्धारण नहीं किया गया, तो यह न्यायिक निर्णयों की स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर असर डाल सकता है।
सम्मेलन में उन्होंने न्यायपालिका के मानकों को बनाए रखने और समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप न्यायिक प्रणाली के महत्व पर जोर दिया। न्यायाधीश नाथ के विचारों ने अदालतों और वकीलों दोनों के लिए न्याय के उच्च मानकों को बनाए रखने का संदेश दिया।
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