पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव ने भारत के निर्यात और आयात कारोबार को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। जहाजों की आवाजाही बाधित होने और कंटेनरों की कमी के कारण सरकार ने घरेलू कंटेनर विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए कदम तेज कर दिए हैं।
केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित 10,000 करोड़ रुपये की कंटेनर विनिर्माण योजना का पहला परिणाम 3 जुलाई को सामने आया। डीसीएम श्रीराम समूह द्वारा भारत में निर्मित पहला एक्सिम कंटेनर उत्तर प्रदेश के दादरी में वैश्विक शिपिंग कंपनी माएर्स्क को सौंपा गया। कंपनी ने इसके बाद 1,000 अतिरिक्त कंटेनरों का नया ऑर्डर भी दिया है।
भारत से हर वर्ष सामान्य परिस्थितियों में लगभग 45 लाख टन बासमती चावल ईरान निर्यात किया जाता है। हालांकि मौजूदा हालात में कांडला और मुंबई बंदरगाहों से ईरान के लिए जहाजों की उपलब्धता बेहद सीमित हो गई है।
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इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन के अध्यक्ष प्रेम गर्ग ने बताया कि वर्तमान में 26.5 टन चावल ले जाने वाले 20 फुट के एक कंटेनर की बुकिंग लागत लगभग 5,000 अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई है। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि कंटेनर बुक होने के बाद भी जहाज कब उपलब्ध होगा, इसकी कोई निश्चितता नहीं है।
इस संकट का असर अन्य निर्यातकों पर भी पड़ा है। कोयंबटूर कस्टम ब्रोकर एंड शिपिंग एजेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष आर. राजेश कुमार ने बताया कि उनके एक ग्राहक ने कोच्चि से इराक के लिए 1,500 डॉलर में कंटेनर बुक किया था, लेकिन पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण प्रमुख बंदरगाहों पर खाली कंटेनरों की भारी कमी हो गई। परिणामस्वरूप, एक खाली कंटेनर की व्यवस्था करने की लागत बढ़कर 50,000 अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू कंटेनर निर्माण को बढ़ावा देने की सरकारी पहल भविष्य में ऐसे वैश्विक आपूर्ति संकटों से निपटने और भारत के निर्यात तंत्र को अधिक मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
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