पिछले एक दशक में भारत ने रक्षा क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति करते हुए अपनी रणनीतिक स्थिति को वैश्विक स्तर पर मजबूत किया है। स्वदेशी रक्षा उत्पादन, आधुनिक सैन्य क्षमताओं के विकास और सक्रिय रक्षा कूटनीति के माध्यम से नई दिल्ली ने राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव दोनों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।
भारत की रक्षा कूटनीति बीते दस वर्षों में राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरी है। नई दिल्ली ने अमेरिका, फ्रांस, रूस, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कई अन्य प्रमुख देशों के साथ रक्षा सहयोग को मजबूत किया है। साथ ही, भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलित संबंध कायम रखे हैं।
‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा दिया गया है। देश में निर्मित मिसाइल प्रणालियां, युद्धपोत, लड़ाकू विमान, ड्रोन और अन्य सैन्य उपकरण भारत की बढ़ती रक्षा क्षमता का प्रतीक बन चुके हैं। इससे न केवल आयात पर निर्भरता कम हुई है, बल्कि भारत रक्षा निर्यात के क्षेत्र में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।
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रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका, बहुपक्षीय सुरक्षा सहयोग और संयुक्त सैन्य अभ्यासों ने देश की वैश्विक रणनीतिक स्थिति को मजबूत किया है। इसके अलावा, आपदा राहत, समुद्री सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी अभियानों में भारत की सक्रिय भागीदारी ने उसे एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित किया है।
विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए सरकार रक्षा आधुनिकीकरण और सैन्य आत्मनिर्भरता पर विशेष जोर दे रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, मजबूत रक्षा ढांचा और प्रभावी कूटनीति भारत को आने वाले वर्षों में वैश्विक शक्ति के रूप में और सशक्त बनाएंगे।
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