भारत का फार्मास्यूटिकल क्षेत्र तेजी से वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है और अब यह केवल जेनेरिक दवाओं के उत्पादन तक सीमित नहीं रहा। अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ (NIH) के पूर्व निदेशक डॉ. एलियास ज़ेरहौनी के अनुसार, भारत का फार्मा सेक्टर नवाचार, वैक्सीन निर्माण और क्लिनिकल क्षमताओं के विस्तार के कारण एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है।
उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच स्वास्थ्य और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। यह संबंध अब केवल निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि नवाचार आधारित साझेदारी में विकसित हो रहा है। भारतीय कंपनियों की वैश्विक उपस्थिति बढ़ रही है, जिससे दोनों देशों के बीच तकनीकी और शोध सहयोग को बढ़ावा मिल रहा है।
ज़ेरहौनी ने बताया कि भारत अभी भी जेनेरिक दवाओं और एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) के उत्पादन में अग्रणी है, जो वैश्विक दवा आपूर्ति की रीढ़ हैं। दुनिया भर में दवाओं की बड़ी आपूर्ति भारत से होती है, जिससे उसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण बनती है।
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हालांकि, भारत की पहचान अब इससे आगे बढ़कर वैक्सीन निर्माण में भी स्थापित हो चुकी है। उन्होंने कहा कि भारत के योगदान के बिना वैश्विक टीकाकरण अभियान को सफल बनाना मुश्किल होता। यह भारत की उत्पादन क्षमता और तकनीकी दक्षता को दर्शाता है।
उन्होंने “फ्रुगल इनोवेशन” यानी कम लागत में प्रभावी समाधान विकसित करने की भारतीय क्षमता को विशेष रूप से सराहा। उनके अनुसार, भारत में नवाचार का उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच बनाना होता है, जो इसे अन्य देशों से अलग बनाता है।
कोविड-19 महामारी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस संकट ने वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली की कमजोरियों को उजागर किया और देशों को अपनी स्वास्थ्य सुरक्षा रणनीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया।
क्लिनिकल ट्रायल्स के क्षेत्र में भारत अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन इसमें लगातार सुधार हो रहा है। नियामक ढांचा और अनुसंधान संस्कृति धीरे-धीरे विकसित हो रही है, जिससे भविष्य में बेहतर परिणाम मिलने की संभावना है।
उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक स्तर पर एक बदलाव देखा जा रहा है, जहां कई देश चीन के बजाय भारत के साथ सहयोग बढ़ा रहे हैं। इससे मेडिकल टेक्नोलॉजी और बायोमेडिकल रिसर्च में भारत की भूमिका और मजबूत हो रही है।
ज़ेरहौनी के अनुसार, जहां अमेरिका में स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे बड़ी चुनौती लागत है, वहीं भारत का ध्यान अधिक से अधिक लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने पर केंद्रित है।
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