जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में सोमवार को नौवां दीक्षांत समारोह आयोजित किया गया, जिसमें कुल 467 पीएचडी विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान की गईं। इनमें 211 महिला और 256 पुरुष शोधार्थी शामिल थे। इस अवसर पर भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे, जबकि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने विशिष्ट अतिथि के रूप में समारोह को संबोधित किया। जेएनयू के कुलाधिपति कंवल सिब्बल ने समारोह की अध्यक्षता की और कुलपति प्रोफेसर संतिश्री धुलिपुड़ी पंडित ने स्वागत भाषण दिया।
अपने संबोधन में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि जेएनयू से स्नातक होने वाले विद्यार्थियों पर केवल शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित न रहकर समाज के प्रति भी विशेष जिम्मेदारी होती है। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में सकारात्मक योगदान देना है।
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने अपने भाषण में भारत की प्राचीन सभ्यतागत विरासत पर प्रकाश डालते हुए नालंदा और तक्षशिला जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा सदियों पुरानी है और यहां शिक्षा को हमेशा सामाजिक और नैतिक जीवन के केंद्र में रखा गया है।
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उन्होंने उपनिषद, भगवद गीता, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और तिरुवल्लुवर के तिरुक्कुरल जैसे ग्रंथों का हवाला देते हुए कहा कि इन शास्त्रों और शास्त्रीय ग्रंथों में ज्ञान, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व को अत्यंत महत्व दिया गया है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि आज के दौर में भी इन मूल्यों की प्रासंगिकता बनी हुई है और युवाओं को इन्हें आत्मसात करना चाहिए।
समारोह में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से निकलने वाले शोधार्थियों को वैश्विक चुनौतियों के समाधान, सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए। दीक्षांत समारोह में विद्यार्थियों और उनके परिवारों के लिए यह एक गर्व का क्षण रहा।
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