मदुरै हाईकोर्ट ने तमिलनाडु के तिरुपरंकुंड्रम पहाड़ी शिखर पर स्थित पत्थर के स्तंभ पर कार्तिगई दीपम जलाने के आदेश को बरकरार रखते हुए वर्षों से चले आ रहे विवाद पर विराम लगा दिया है। न्यायमूर्ति जी. जयचंद्रन और न्यायमूर्ति के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि दीपम जलाने का मुद्दा “अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग” ले चुका है।
अदालत ने टिप्पणी की कि जिला प्रशासन को इस संवेदनशील मुद्दे को समुदायों के बीच संवाद और मध्यस्थता के अवसर के रूप में लेना चाहिए था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि पहाड़ी एक संरक्षित स्थल है, इसलिए वहां होने वाली किसी भी गतिविधि को संबंधित अधिनियमों के प्रावधानों का सख्ती से पालन करना होगा।
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि दीपक जलाने की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन समारोह के दौरान आम लोगों की पहुंच सीमित रहेगी और यह प्रक्रिया भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से परामर्श के अधीन होगी।
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यह मामला हिंदू तमिल पार्टी के नेता रामा रविकुमार द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने पहाड़ी शिखर पर कार्तिगई दीपम जलाने के निर्देश देने की मांग की थी। पिछले वर्ष 1 दिसंबर को न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन ने याचिका स्वीकार करते हुए त्योहार के दिन दीप जलाने का आदेश दिया था, लेकिन संभावित कानून-व्यवस्था की आशंका के चलते प्रशासन ने इसे लागू नहीं किया।
मंदिर प्रशासन का कहना है कि यह वही पारंपरिक स्थान है जहां पिछले सौ वर्षों से अधिक समय से परंपरा और आगम शास्त्रों के अनुसार दीपम जलाया जाता रहा है। दूसरी ओर, राज्य सरकार और कुछ प्रशासनिक अधिकारियों ने यह तर्क दिया कि पहाड़ी पर दीप स्तंभ के अस्तित्व का ठोस प्रमाण नहीं है। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि वहां दीप जलाने से कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है, क्योंकि उसी पहाड़ी पर एक दरगाह भी स्थित है।
इस विवाद के दौरान तनाव तब और बढ़ गया जब कथित तौर पर इस मुद्दे से आहत एक 40 वर्षीय व्यक्ति ने आत्मदाह कर लिया।
बीजेपी की प्रतिक्रिया
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने मदुरै हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए इसे तमिलनाडु में “हिंदू आस्था की बड़ी जीत बताया। पार्टी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने सत्तारूढ़ डीएमके पर निशाना साधते हुए इसे उनके लिए बड़ी शर्मिंदगी करार दिया।
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