कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के पहले चरण में दर्ज हुए उच्च मतदान प्रतिशत पर सवाल उठाते हुए इसे “सांख्यिकीय भ्रम” करार दिया है। उन्होंने कहा कि यह बढ़ा हुआ आंकड़ा विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) की प्रक्रिया का परिणाम हो सकता है, जिससे मतदाता सूची में बदलाव हुआ है।
तिवारी ने अपने बयान में कहा कि मतदान प्रतिशत में असामान्य वृद्धि को सीधे तौर पर जनता की बढ़ती भागीदारी के रूप में देखना सही नहीं होगा। उनके अनुसार, मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान कई नाम जोड़े या हटाए जाते हैं, जिससे कुल मतदाताओं की संख्या में बदलाव आता है और इससे मतदान प्रतिशत पर असर पड़ता है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि SIR प्रक्रिया के चलते वास्तविक मतदान के आंकड़े और प्रतिशत के बीच अंतर उत्पन्न हो सकता है, जिसे सही तरीके से समझना जरूरी है। तिवारी ने चुनाव आयोग से इस विषय पर पारदर्शिता बरतने और विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है।
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पश्चिम बंगाल में पहले चरण के मतदान में रिकॉर्ड स्तर पर मतदान दर्ज किया गया था, जिसे कई राजनीतिक दलों ने जनता की सक्रिय भागीदारी का संकेत बताया। वहीं तमिलनाडु में भी मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत अधिक रहा।
हालांकि, तिवारी के इस बयान ने चुनावी माहौल में नई बहस छेड़ दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयान चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर सकते हैं, जबकि कुछ लोग इसे आंकड़ों की गहन समीक्षा की जरूरत के रूप में देख रहे हैं।
चुनाव आयोग की ओर से फिलहाल इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और चर्चा होने की संभावना है।
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